बाल संस्कार

अभावग्रस्त बच्चों के लिए छात्रावास का शुभारंभ

*श्रुतम्-216*

 *अभावग्रस्त बच्चों के लिए छात्रावास का शुभारंभ*

 

दिनांक 19 मई 1985 को हिमाचल के सोलन जिले के शिल्ली गांव में वनवासी कल्याण आश्रम का प्रथम छात्रावास प्रारंभ हुआ। शिल्ली गांव सोलन शहर से 4 किमी की दूरी पर स्थित है। यह छात्रावास 2 बालक तथा 2 बालिकाओं से प्रारंभ किया गया था। इसके लिए आश्रम के प्रथम अध्यक्ष कृष्णपाल जी ने 4 बीघा जमीन देकर सेवा व समर्पण की प्रथम ज्योति प्रज्ज्वलित की।

आज इस छात्रावास में 50 बच्चे तीसरी कक्षा से लेकर बीए तक की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

सोलन नगर से डॉक्टर राजीव बिंदल बिहार के जनजातीय क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे चुके थे, उनके अनुभव का लाभ इस छात्रावास को मिला।

हिमगिरी कल्याण आश्रम को 7 वर्ष का समय देने वाले दंपति रवि और शारदा का महत्वपूर्ण योगदान रहा। यह दोनों कर्नाटक के रहने वाले थे परंतु हिमाचल प्रदेश के वनवासियों के बीच ऐसे रच बस गए थे कि ऐसा लगता था जैसे ही उन्होंने यहीं पर जन्म लिया हो।

यहां की कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए उन्होंने सांगला किन्नौर में छात्राओं का छात्रावास प्रारंभ किया। इन दो छात्रावासों के उपरांत 1997 में शिमला तथा 28 फरवरी 1999 को चंबा जिले के कियाणी गांव में कल्याण आश्रम ने छात्रावास प्रारंभ किया।

चंबा जिले के कियाणी छात्रावास की घटना भिन्न प्रकार की है। यह एक दुखद घटना का परिणाम था जिसमें उग्रवादियों द्वारा चंबा के कालावन स्थान पर 45 मजदूरों की निर्मम हत्या कर मौत के घाट उतार दिया था। इन मजदूरों के बच्चों को देखने वाला पीछे कोई नहीं बचा था। पढ़ाई तो दूर उन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं थी। इस दुख की घड़ी में चंबा जिले के *स्वयंसेवको ने हिमगिरी कल्याण आश्रम के माध्यम से इन रोते बिलखते बच्चों की कमान अपने हाथों में ली और चंबा की कियाणी गांव में एकलव्य छात्रावास अस्तित्व में आया।*

इस कल्याण आश्रम के लिए जब धन संग्रह हो रहा था तो चंबा में एक प्रेरणास्पद उदाहरण सामने आया। धन संग्रह कर रही टोली एक परिवार में पहुंची। उस टोली ने इस परिवार में उस दुखद घटना का वर्णन किया जो मजदूरों के साथ कालावन में घटी थी।

घर पर रसोई में बर्तन साफ कर रही वह बहन भी उन बातों को सुन रही थी। घरों में बर्तन साफ कर ही अपना गुजारा करने वाली उस महिला का हृदय अंदर से कांप उठा। वह रसोई से ही बोल उठी बाबूजी जो मेरे ₹300 बनते हैं उन्हें भी कल्याण आश्रम के लिए ले लो। जब उससे पूछा कि आप अपने सारे पैसे कल्याण आश्रम को दे दोगी तो स्वयं महीना भर कैसे गुजारा करोगी?

उस महिला का उत्तर सुनने वाला था। उसने कहा- *” मैं तो कुछ भी कर लूंगी पर वे बच्चे क्या करेंगे जिन्हें रोने के अतिरिक्त कुछ नहीं आता? इसकी चिंता ना करो कि मेरा क्या होगा? मेरे पैसे बच्चों के लिए दे दो।”*  उस गरीब की दया को देखकर सभी दंग रह गए तथा कल्याण आश्रम में किसी प्रकार की कमी नहीं रही।

*एक घटना से प्रारंभ हुआ छात्रावास आज अनेक अभावग्रस्त विद्यार्थियों का आश्रय स्थल बन गया है।*

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *