बाल संस्कार

*अम्बेडकर जी की दृष्टि में  वंचितों के राजनीतिक सशक्तिकरण की अनिवार्यता*

*श्रुतम्-161*

*अम्बेडकर जी की दृष्टि में  वंचितों के राजनीतिक सशक्तिकरण की अनिवार्यता*

अम्बेडकर वंचितों का राजनीतिक सशक्तिकरण चाहते थे। उसी का नतीजा है कि आज लोकसभा की 79 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए और 41 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित की गई हैं। सरकार ने संविधान संशोधन कर यह राजनीतिक आरक्षण 2026 तक कर दिया है। शुरू में आरक्षण केवल 10 वर्ष के लिए था। यह राजनीतिक आरक्षण इन समूहों का कितना सशक्तिकरण कर पाया है, यह आज के समय का एक बड़ा सवाल है। अपना जनसमर्थन खो देने के डर से कोई भी राजनीतिक दल इस पर चर्चा नहीं करना चाहता।देखा जाए तो दल-बदल कानून के रहते यह संभव ही नहीं है कि कोई वंचित-वनवासी विधायक या सांसद अपनी मर्जी से वोट कर सके। हमने देखा है कि कुछ साल पहले लोकसभा में ऐसे सांसदों ने एक फोरम बनाया था, इन वर्गों के अधिकारों के लिए, पार्टी लाइन से ऊपर उठकर। दल-बदल कानून के कारण वह बेअसर रहा है। अम्बेडकर दूरदर्शी नेता थे, उन्हें अहसास था कि इन समूहों को बराबरी का दर्जा पाने में बहुत समय लगेगा, वे यह भी जानते थे कि सिर्फ आरक्षण से सामाजिक न्याय सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।अम्बेडकर का पूरा जोर वंचित वर्गों में शिक्षा के प्रसार और राजनीतिक चेतना जगाने का रहा है। आरक्षण उनके लिए एक सीमाबद्ध योजना थी। दुर्भाग्य से आज उनके अनुयायी इन बातों को भुला चुके हैं। बड़ा सवाल यह है कि स्वतंत्रता के 67 सालों बाद भी अगर भारतीय समाज इन वंचित-वनवासी समूहों को पूरी तरह आत्मसात नहीं कर पाया है, तो जरूरत है पूरे संवैधानिक प्रावधानों पर नई सोच के साथ देखने की, ताकि इन वर्गों को सामाजिक बराबरी के स्तर पर खड़ा किया जा सके।

 

 

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