बाल संस्कार

 *उद्यमशीलता*

*श्रुतम्-201*

 *उद्यमशीलता*

यदि हम चाहते हैं कि व्यक्ति समाज एवं राष्ट्र की उन्नति हो तथा विश्व में हमारा डंका बजे तो हमें उद्यम का सहारा लेना पड़ेगा।

उद्यमशीलता को भारतीय जीवन का स्थाई भाव बनाना होगा। हमारे श्रेष्ठ पूर्वजों की दिनचर्या ब्रह्म मुहूर्त प्रारंभ में होती थी।

भोर में 3:30-4:00 बजे

वे उठते थे। अंतः करण में विराजमान ईश्वर का साक्षात्कार करते हुए वे अपने अंदर स्थित प्रचंड शक्तियों का अनुभव करते थे और तब उनका दैनिक जीवन चालू होता था।

प्रत्येक दिन उनका जीवन मानो एक महान यज्ञ होता था। उन्हीं की हम संतान हैं। वे सब शक्तियां हमारे अंदर भी है। शस्त्रों का प्रयोग न होने से वह बेकार हो जाते हैं। मन की अथवा शरीर की शक्तियों का भी ऐसा ही है। उद्यम करने से वे प्रकट होती है। उद्यम न करने से, अकर्मण्य रहने से, वे बेचारी जहां की तहां तड़प तड़प कर मर जाती है।

 

जो उद्यम करता है उसे अपने आप सब की सहानुभूति प्राप्त होती है। प्रत्यक्ष भगवान भी उसी मनुष्य की सहायता करता है, जो प्रचंड परिश्रम करता है। वेद वचन प्रसिद्ध है-

*न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवा:* ।

*(ऋग्वेदः-४.३३.११)*

अर्थात् जब तक मनुष्य परिश्रम करके अपने को थका नहीं लेता तब तक ईश्वर की दया का पात्र नहीं बन सकता ।

 

लेकिन वर्तमान में हमारे देश में ऐसे भी संगठन, संस्थाएं और राजनीतिक दल है जो यह दिन रात मांग करते हैं कि काम के घंटे कम हो और वेतन अधिक मिले या  बिना परिश्रम के ही जनता को सब कुछ नि:शुल्क दे दिया जाए। और परिणामस्वरूप देश के विकास की गति धीरे-धीरे मंद पड़ रही है और हम विश्व में पिछड़ रहे हैं।

 

*उद्यमशीलता,कर्तव्य दक्षता और कार्यकुशलता बढ़े इस हेतु नि:स्वार्थ बुद्धि एवं देश हितेषी दृष्टि से प्रयत्न करने होंगे। और देश के सभी लोगों को इस ओर प्रयत्न करने होंगे, चिंतन करना होगा तभी भारत विश्व में सर्व-समर्थ बनकर संपूर्ण दुनिया का हित करने में समर्थ हो सकता है।*

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