बाल संस्कार

  उमराव सिंह सूबेदार

स्वाधीनता का अमृत महोत्सव

मध्यभारत के गुमनाम नायक (Unsung Heroes) ……

                             

  उमराव सिंह सूबेदार

                                     

1857 की क्रांति में अनेक क्रांतिकारी नेताओं ने अपने दलबल सहित झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को सहयोग दिया था उनमें एक थे भाण्डेर (ग्वालियर) निवासी उमराव सिंह सूबेदार । भाण्डेर उन दिनों सिंधिया शासन के अन्तर्गत था और जंगलों के बीच स्थित था । यहाँ कई  वार क्रांतिकारी विचरण करते रहते थे । उमराव सिंह सूबेदार के दल में ऐसे ही अनेक क्रांतिकारी शामिल थे । भाण्डेर में अनेक क्रांतिकारियों का जमाव रहता था और उन पर सिन्धिया तथा ब्रिटिश फोर्स को लेकर कैप्टन आसबर्न इन क्रांतिकारियों का दमन करने के लिए बढ़ा । उसने बहुत कुछ सफलता भी पाई, लेकिन क्रांतिकारियों ने अपना साहस नहीं छोड़ा । आसबर्न के चले जाने के बाद इस इलाके में पहले जैसा हाल हो गया ।

ब्रिटिश शासन के हाथों से झाँसी राज्य निकल चुका तथा वहाँ रानी लक्ष्मीबाई का आधिपत्य बना हुआ था । झाँसी की रानी का प्रभुत्व उस समय इतना बढ़ गया था कि सिन्धिया सरकार के इलाकों से अनेक क्रांतिकारी आकर झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई को अपना सहयोग देने लगे । इसी तारतम्य में भाण्डेर परगना के अनेक क्रांतिकारी  झांसी रानी की तरफ हो गये । उनका प्रमुख नेता उमराव सिंह सूबेदार थे । ऐसी हालात में झांसी की रानी को भाण्डेर पर, अक्टूबर में आक्रमण करने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं हुई और रानी ने उमराव सिंह सूबेदार के सहयोग से भाण्डेर परगना पर कब्जा कर लिया ।

जनवरी-फरवरी 1858 में उमराव सिंह सूबेदार की क्रांतिकारी गतिविधियां इतनी अधिक बढ़ गयी थीं कि भाण्डेर के कमाविसदार ने सिन्धिया सरकार को लिखा कि उमरावसिंह सूबेदार से मुकाबले करने हेतु उसे पर्याप्त सैनिक उपलब्ध कराये जायें। कमाविसदार यह भी महसूस कर रहा था कि उसके साथी भी उसकी मदद नहीं कर रहे हैं। इन सब बातों से परेशान होकर वह ग्वालियर चला गया। अब उमरावसिंह सूबेदार ने भाण्डेर पर अपना आधिपत्य जमाया ।

8 फरवरी 1858 को अपने 500 क्रांतिकारी सैनिकों के साथ उमरावसिंह सूबेदार ने भाण्डेर पर गोलीबारी की । भाण्डेर के कामविसदार ने सूबेदार का मुकाबले में दोनों ओर के पाँच आदमी मारे गये तथा घायल हुए । 13 फरवरी 1858 को 500 आदमियों के साथ उमरावसिंह सूबेदार ने भाण्डेर पर पुनः हमला बोला और वहाँ के कामविसदार को पीछे हटना पड़ा। इस मुठभेड़ में दोनों ओर के पांच आदमी मारे गये।

मार्च 1858 के अंतिम दिनों में सर हूय्रोज झांसी पर घेरा डाले हुए था तथा ब्रिटिश फोर्स झांसी के किले पर निरन्तर गोले बरसा रही थी। ज्योंही भाण्डेर के क्रांतिकारियों को इसकी खबर लगी, वे झांसी को मुक्त कराने के लिए भाण्डेर से प्रस्थान करने लगे । भाण्डेर से करीब दो हजार सशस्त्र क्रांतिकारी उमराव सिंह सूबेदार के नेतृत्व में चल दिए। दुर्भाग्य से झांसी की रानी की इस युद्ध में पराजय हो गयी और उसे झांसी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।

झांसी की लड़ाई में ब्रिटिश फोर्स से पराजित होने के बाद, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई 3 अप्रैल की रात को किले से बाहर निकल गयी। ब्रिटिश फोर्स तो रानी के पीछे पड़ी हुई थी। लेफ्टिनेन्ट डाकर अपनी फोर्स के साथ रानी का पीछा कर रहा था । 5 अप्रैल को रानी अपने पांच सवारों सहित दोपहर 12 बजे के करीब भाण्डेर पहुंची । उमराव सिंह सूबेदार तो झांसी से भाग कर पहले ही भाण्डेर पहुँच गये थे । रानी भाण्डेर की तहसीली में ठहरी । रानी के भाण्डेर पहुँचने पर सूबेदार ने रानी का स्वागत किया। रानी ने सूबेदार से कहा, ‘‘मै तीन दिन से भूखी हूँ । सूबेदार ने तुरन्त हीं दूध का प्रबंध किया तथा भोजन तैयार कराने में लोगों को लगा दिया। रानी थोड़ा सा ही दूध पी सकी थी और आराम करना चाहती थी कि इतने में रानी को खबर दी गयी कि ब्रिटिश फोर्स पीछा करती हुई भाण्डेर आ पहुँची है। रानी ने अविलम्ब दूध का गिलास फेंका और तुरन्त अपने घोड़े पर सवार हुई और घोड़े को सरपट दौड़ाती हुई कालपी के लिए चल दीं लेफ्टिनेन्ट डकार यह भी कहता है कि ‘‘यदि रानी का भाण्डेर से प्रस्थान करने में पौन घंटे का विलम्ब हो जाता तो रानी का तथा ब्रिटिश फोर्स का मुकाबला हो ही जाता ।

जब लेफ्टिनेंट डाकर अपनी फोर्स के साथ भाण्डेर पहुंचा तो वहाँ रानी को न पाकर बड़ा हताश हुआ। रानी के, कुछ सवार भाण्डेर ही में रह गये थे। उनसे तो ब्रिटिश फोर्स की मुठभेड़ हो ही गयी। इस मुठभेड़ में  रानी के जोशीले सवारों ने डटकर मुकाबला किया । इस मुठभेड़ में  लेफ्टिनेंट डाकर बुरी तरह से घायल हो गया और वह अपने घोडे़ से नीचे गिर गया। डाकर के ऊपर रानी के सवारों का तलवार का वार इतना जोर का था कि वह गंभीर रूप से घायल हो गया। इसके बाद वह कालपी की ओर चल दिया।

झांसी के पतन के बाद वहाँ पर एकत्र क्रांतिकारी  इधर-उधर पलायन करने लगे । 4 अप्रैल 1858 को करीब एक हजार क्रांतिकारी चिरगांव होते हुए कालपी की ओर जाते हुए देखे गये । चिरगांव पहुँचने पर इन क्रांतिकारियों का ब्रिटिश फोर्स से मुकाबला हो गया। ब्रिटिश फोर्स की फायरिंग के आगे क्रांतिकारी टिक नहीं सके तथा वे भागने के लिये विवश हो गये । उन्होंने भाण्डेर का रास्ता पकड़ा, जहाँ पर पेशवा की फोर्स अन्य स्थानों से आकर इकट्ठी हो रही थी । तात्या टोपे भी अपने चार हजार साथियों सहित बेतवा नदी की कदोरघाट से पार करते हुए 5 अप्रैल की दोपहर को भाण्डेर पहुँचे । वहाँ पर उमरावसिंह सूबेदार अपने साथियों सहित तात्या टोपे से मिल गये । उनके साथ 2 हजार आदमी तथा 5 तोपें थी । उस समय तात्या टोपे के साथ सवारों की संख्या 6 हजार थी साथ में 3 तोपें भी थी । भाण्डेर के रसदखाने के प्रभारी के साथ दो हजार आदमी भी आ मिले। ब्रिटिश फोर्स तात्या टोपे तथा क्रांतिकारियों का पीछा कर रही थी । जब ब्रिटिश फोर्स इनका पीछा करती हुई भाण्डेर पहुंची  तो इस फोर्स ने देखा कि क्रांतिकारी काफी पहले भाण्डेर छोड़कर जा चुके हैं।

नरवर का राजा मानसिंह, झांसी युद्ध में परास्त होने पर झांसी से भागा तथा 3 अप्रैल को भाण्डेर आया । इसके अगले ही दिन तात्या टोपे पाँच सौ सवारों सहित यहाँ आ पहुँचे । तथा 5 अप्रैल को दोपहर कोंच के लिये चल दिये और उसी शाम वहाँ से कालपी के लिए चल दिये । इन सभी क्रांतिकारियों ने 5 अपै्ल को प्रातः काल उमराव सिंह सूबेदार तथा तात्या टोपे ने नरवर के राजा मान के साथ कालपी के लिए प्रस्थान कर दिया। इस तरह भाण्डेर क्रांतिकारियों से पूरी तरह खाली हो गया ।

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