बाल संस्कार

कर्नल जी.एस. ढिल्लन

स्वाधीनता का अमृत महोत्सव

मध्यभारत के गुमनाम नायक (Unsung Heroes) ……

कर्नल जी.एस. ढिल्लन

कर्नल जी.एस. ढिल्लन का जन्म 18 मार्च 1914 हुआ। आपके पिता ठाकुर सिंह ढिल्लन थे। कर्नल जी.एस. ढिल्लन ने देहरादून मिलिट्री से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। 13 दिसम्बर 1942 को 15000 ब्रिटिश युद्ध बंदियों का नेतृत्व करते हुए आजाद हिन्द सेना में सम्मिलित हुए। 17 मई 1945 को विदेशी सेना से लड़ते हुए पग (वर्मा) में बंदी बनाये गये और उन पर मुकदमा चलाया गया।

ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के कारण सजा दी गयी। 232 दिन रंगूने व लाल किले में कारावास।

आजाद हिन्द सेना के जांबाज योद्धा कर्नल गुरू बख्श सिंह ढिल्लो का जन्म अविभाजित पंजाब प्रेदश के लाहोर जिले के गांव अलगो मे ं14 मार्च सन् 1914 में हुआ था। कर्नल ढिल्लो के पैतुक गांव में स्कूल नहीं होने के कारण उनकी शिक्षा लाहोर, मोंटगोमरी तथा सोलन में हुई। हाई स्केल की परीक्षा उत्तीर्ण करने बाद उन्होंने सन् 1931 एफएससी की परीक्षा पास की। वह शुरू से ही सेना में शामिल होने का सपना देखा करते थे। इसलिए सेना में भर्ती होने के लिए इस के बाद उन्होंने आईएमएफ की परीक्षा प्राप्त किया और सन् 1940 में ढिल्लों ब्रिटिश भारत सेना की पंजाब रेजीमेंट में कमीशंड अधिकारी नियुक्त किए गए। इस समय तक दूसरे विश्व युद्ध के हालात सामने आने लगे थे। ढिल्लो की सेना में नियुक्ति के बाद उन्हें बाहर के दशों में भेजा गया और वहां से लौटने के बाद उन्हें सेना की आर्स सिग्नल कोर में पदस्थ कर के मलाया के मोर्चे पर भेज दिया गया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने जब 15 फरवरी 1942 को आजाद हिन्द सेना का गठन किया तो ढिल्लों का मन आजाद हिन्द सेना का योद्धा बनने के लिए मचलने लगा। मलाया मोर्चे पर जब जापानी सेना से ब्रिटिश सेना पराजित हो गई हो गई तो उसे समर्पण करना पड़ा। नेताजी ने ब्रिटिश आर्मी के भारतीय जवानों को आजाद हिन्द सेना में शामिल कर लिया। नेताजी ने ढिल्लों को कर्नल के पद पर नियुक्त कर के चौथी गुरिल्ला रेजीमेंट (नेहरू बिग्रेड) की कमान सोंप कर उनकी टुकड़ी को वर्मा के, जिसे अब म्यांमार कहा जाता है, के ईरावदी मोर्चे पर तैनात कर दिया। आजाद हिन्द सेना साधनहीन तो थी ही उस में शामिल सैनिकों में अधिकांश अप्रशिक्षिम या अर्द्ध प्रशिक्षित थे। कर्नल ढिल्लो के नेतृत्व में आजाद हिन्द सेना की चौथी ब्रिगेड ने ब्रिटिश फौजों का बहादुरी से मुकाबला करते हुए एक हफ्ते तक उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया। इस युद्ध में पराजय के बाद कर्नल ढिल्लो को बन्दी बना कर कोलकत्ता के युद्ध बन्दी केम्प मं भेज दिया गया। कुछ समय बाद कर्नल ढिल्लो, मेजर जनरल शाहनवाज तथा कर्नल प्रेम कुमार सहगल को कोलकाता से दिल्ली के सलीम गढ़ किले मं बन्दी बना कर रखा गया।

दिल्ली के लाल किले में 5 नवम्बर से 31 दिसम्बर 1945 तक ब्रिटिश सरकार के खिलाफ राजद्रोह में कोर्ट मार्शल के तहत मुकद्मा चला। बचाव पक्ष की पैरवी जवाहर लाल नेहरू ने की। मुकदद्मे के फैसल में किसी को मौत की तो किसी को कालेपानी की सजा दी गई। 3 जनवरी 1946 में 9 महीने 2 दिन बाद तीनों को जेल से रिहा कर दिया गया। कर्नल ढिल्लो ने फ्राम माई बांस नाम से अपनी आत्माकथा लिखी है जिसमें उनके शिवपुरी के स्थायी निवासी होने के बारे में विस्तार से रोचक जानकारी दी गई है। स्वतंत्रता के बाद कर्नल ढिल्लो को उनकी उत्कृष्ट राष्ट्र सेवाओं के लिए कई जगह राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया है। 21 अक्टूबर 1995 में कर्नल ढिल्लो को आजाद हिन्द फौज एक्सपिडीशन सम्मान प्रदान किया गया। इस के साथ ही सलीम गढ़ किले में जहाँ कर्नल ढिल्लो आदि को बन्दी बना कर रखा गया था उसे राष्ट्रीय संग्रहालय बनाने की घोषणा की गई। भारत सरकार ने इन पर एक विशेष डाक टिकट भी जारी किया था। कर्नल ढिल्लो को राष्ट्रपति की ओर से पद्मश्री एवं पद्मभूषण सम्मान प्रदान किया गया। 6 फरवरी 2006 में 92 वर्ष की आयु में आजाद हिन्द सेना के इस जांबाज योद्धा ने अपने यशस्वी जीवन की अन्तिम सांस ली। शिवपुरी में राजकीय सम्मान के साथ उनके फार्म हाऊस के निकट हातोद गांव में उनका अन्तिम संस्कार किया गया।

 

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