बाल संस्कार

 चार धाम

*श्रुतम्-278*

 *चार धाम*

भारतवर्ष अनादि काल से एक इकाई के रूप में विद्यमान रहा है। इसकी एकात्मता चारों दिशाओं में स्थित *चार धामों( बद्रीनाथ, रामेश्वरम्, द्वारिका, जगन्नाथ पुरी)* के द्वारा और अधिक पुष्ट हुई है।

धुर दक्षिण में स्थित रामेश्वर धाम में अधिष्ठित प्रतिमा का अभिषेक गंगाजल से किया जाता है। जाति बंधन से मुक्त होकर पूजा अर्चना के लिए उनकी यात्रा का विधान है। देश के सभी प्रांतों के निवासी इनकी यात्रा कर स्वयं को धन्य मानते हैं।

*बद्रीनाथ*

बद्रीनाथ धाम *भारत का सबसे प्राचीन* तीर्थ क्षेत्र है। इसकी स्थापना *सत्ययुग* में हुई थी।

*सत्ययुग में नर और नारायण ने, त्रेता में भगवान दत्तात्रेय ने, द्वापर में वेदव्यास और कलियुग में आदिशंकराचार्य* ने इस क्षेत्र की प्रतिष्ठा बढ़ाई।

बद्रीनाथ का मंदिर नारायण पर्वत की तलहटी में *अलकनंदा* के दाएं किनारे पर स्थित है।

यह स्थान *माना दर्रे* से 40 किलोमीटर दक्षिण में है। *नीति दर्रा* यहां से कुछ दूर है। आदिशंकराचार्य ने इसके महत्व को समझ कर मंदिर में उस प्राचीन प्रतिमा की प्रतिष्ठा कराई जो नारद कुंड में गिरकर खो गई थी। *चंद्रवंशी गढवाल नरेश ने विशाल मंदिर* का निर्माण करवाया।

*महारानी अहिल्याबाई* ने मंदिर पर सोने का शिखर चढ़वाया। जो आज भी अपनी चमक बनाए हुए हैं।

मंदिर के समीप *पाँच तीर्थ ऋषि गंगा, कूर्म धारा, प्रहलाद धारा, तप्त कुंड और नारद कुंड* स्थापित है।

बद्रीनाथ धाम में नारद शिला, मार्कण्डेय शिला, नृसिंह शीला,वाराह शिला, गरुड़ शिला नाम से पवित्र शिलाएँ स्थापित है।

बद्रीनाथ से थोड़ा उत्तर में अलकनंदा के तट पर *ब्रह्मपाल नामक पुण्यक्षेत्र* है। यहां पर पूर्वजों का श्राद्ध करने से उन्हें अमित संतोष मिलता है।

8 मील दूर पर वसुधारा तीर्थ है जहां आठ वसुओं ने अपनी मुक्ति के लिए तप किया था।

सर्दी के दिनों में इस मंदिर के कपाट बंद रहते हैं तथा गर्मी आने पर पुनः खुल जाते हैं।

जोशीमठ में शीतकाल में बद्रीनाथ की चल प्रतिमा लाकर स्थापित की जाती है और यहीं पर इसकी पूजा अर्चना की जाती है।

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