बाल संस्कार

डाकोर जी का शंकर

डाकोर जी का शंकर

वीरों की गाथाएँ सुनकर वीरोचित मानस बनता है।

मातृभूमि पर बलि होने का बच्चों में साहस ठनता है।

कहानियाँ तो प्रायः सभी बच्चे सुनते हैं लेकिन सारे बच्चे यह नहीं जानते कि कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं होती हैं बल्कि कहानियाँ हमारे कोमल मन को भविष्य के लिए पक्का बना रही होती हैं। हम जैसी कहानी सुनेंगे, उसकी घटनाएँ आगे चल कर हमारा संस्कार बन जाएँगी। कहानियों का बाल मन पर कैसा प्रभाव रहता है, यह जानना हो तो एक सच्ची घटना बताता हूँ।

एक था शंकर। गुजरात के डाकोर गाँव में रहने वाला। उसके पिता नदी पर जाकर लोगों के कपड़े धोया करते थे। नाम था डाह्या भाई। नन्हा शंकर पिता के पास जब भी होता, कहानी सुनाने का आग्रह करता और वे उसे मना भी नहीं करते। पर वे कहानियाँ परियों की, जादूगर की या मनोरंजन भरी कहानियाँ न होकर देश के लिए बलिदान होने वाले स्वतंत्रता सेनानियों की सच्ची कहानियाँ होती थी। उस समय सारे देश का वातावरण ही कुछ ऐसा था कि हर भारतीय स्वतंत्रता पाने के लिए मचल उठा था। बलिदान देने की होड़ लगी हुई थी।

उस रात डाह्या भाई धोबी घाट से खूब थके हुए लौटे थे, पर शंकर ने आग्रह किया तो वे कहानी सुनाने लगे अमर शहीद भगत सिंह की। कहानी सुनकर शंकर पूछ बैठा, “शाला में गुरुजी कहते हैं कि जिसने भी जन्म लिया है वह मरता ही है। फिर फाँसी पर चढ़ कर भी भगत सिंह अमर कैसे हुए?”

“बेटा! जो महान उद्देश्य के लिए, अपने देश-धर्म के लिए मरते हैं, वे मर जाने पर भी कई पीढ़ियों तक याद रखे जाते हैं इसीलिये अमर कहलाते हैं” और पिता ने ऐसे अनेक महापुरुषों के नाम गिनाए जो अमर कहलाते हैं।

रात को कहानी सुनते समय प्राय: नींद आने लगती है पर शंकर के मन में तो जैसे चैतन्य का विस्फोट हुआ हो, वह एकदम अत्यन्त उत्साह से उठकर खड़ा हुआ और पिता से बोला “बापू! अगर मैं अंग्रेजों को मार भगाऊँ तो मैं भी अमर हो जाऊँगा?”

आजादी के आन्दोलन से डाकोर गाँव अछूता न था। वहाँ भी समय-समय पर जनता को जगाने और फिरंगियों को भगाने की बातों और योजनाओं वाली सभाएं होती रहती थीं और डाया भाई उनमें जाते भी थे। वे देश की वर्तमान परिस्थिति में अपने बच्चे के विचार सुनकर गर्व से भर उठे। बोले, “अवश्य, डीकरा! तू अंग्रेजों को भगाएगा तो लोग तुझे हमेशा याद रखेंगे। तू जरूर अमर बनेगा।” बाप ने बेटे को बाहों में समेट कर खूब लाड़ किया। धन्य हैं ऐसे पिता, जो अपनी संतानों को मातृभूमि की रक्षा की दीक्षा देते हैं।

नन्हा शंकर अब चौदहवें वर्ष में प्रवेश कर चुका था। उधर 9 अगस्त को महात्मा गांधी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा बुलंद कर देशभर को ‘करो या मरो’ का मंत्र दे दिया था। आन्दोलन तो एक प्रत्यक्ष माध्यम था, स्वतंत्रता पाने की छटपटाहट तो भारतवासियों में 1857 से ही तेज हो उठी थी।

डाकोर ग्राम में भी जुलूस निकला। हाथों में तिरंगा थामे शंकर भी पिता के साथ देशभक्ति के नारे लगाता जुलूस में सम्मिलित हुआ। पुलिस बल थोड़ा था और जनता का उत्साह अपार। भीड़ को रोकने आयी पुलिस भीड़ के हाथों अपनी बन्दूकें भी गंवा चुकी थी। सदैव पीटने वाले आज पिट रहे थे। शंकर के हाथों के झण्डे का डण्डा भी जमकर चला। अहिंसक नीति के पक्षधर एक स्वयंसेवक छोटा भाई ने लोगों को रोककर पुलिस वालों की बन्दूकें वापस दिलवाईं और उन्हें सुरक्षित भगाने में सहायता की। दुष्टों पर दया दिखाने का दुष्परिणाम भी तुरंत मिला। कुछ ही समय में भारी पुलिस दल निहत्थे ग्रामवासियों को गोलियों से भून रहा था। छोटा भाई भी उन गोलियों से बच न सके।

इस हत्याकाण्ड का विरोध करने पर भारी प्रदर्शन हुआ कैरा (जिला स्थान) में। शंकर तो अति उत्साहित था ही। माँ ने रोका “बेटा! वहाँ बहुत पुलिस होगी। तुम छोटे हो।”

“छोटा हूँ तो क्या, उस दिन पुलिस वालों की पिटाई नहीं कर सका था?” वह पिता के साथ जाने की ठान चुका था।

करा के उस प्रदर्शन में सैकड़ों पुलिस वाले बन्दूकें ताने सामने खड़े थे और हजारों देशभक्त ‘भारत माता की जय’, ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’, ‘महात्मा गांधी की जय’ के नारे लगाते समुद्र की तूफानी लहरों की तरह आगे बढ़ रहे थे। हाथों में तिरंगा लिये शंकर भी पहली पंक्ति में आगे बढ़ रहा था। गोलियाँ चलती गई, लाशें बिछती गई। शंकर को आज छोटी सी आयु में ही ‘अमर’ होने का अवसर मिल गया था। वह चल पड़ा था शहीद शिरोमणि भगत सिंह से मिलने स्वर्ग की ओर।

 

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