बाल संस्कार

*डाॅक्टर अम्बेडकर की दृष्टि में समरस समाज से ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है*

*श्रुतम्-157*

*डाॅक्टर अम्बेडकर की दृष्टि में समरस समाज से ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है*

वर्तमान समय में राजनीतिक सुविधा के हिसाब से हर कोई डाॅ. अम्बेडकर को अपने अपने तरीके से परिभाषित करने में लगा हुआ है, कुछ उन्हें देवता बनाने में लगे हैं तो कुछ उन्हें केवल वंचितों की धरोहर मानते हैं, कई हैं जो उन्हें हिन्दुओं के विरोधी नायक के रूप में रखते हैं। और तो और भारत के कुछ मार्क्सवादी उन्हें मार्क्स का अग्रदूत मानते हैं। ऐसे भी लोग हैं जो अम्बेडकर के मत-परिवर्तन के सही मर्म को समझे बिना ही आज वंचितों को हिंदुओं से अलग कर उन्हें एक मत के रूप में रखने की मांग करने लगे हैं।   लेकिन कोई इस पर बात नहीं करना चाहता कि डाॅ. अम्बेडकर का पूरा संघर्ष हिंदू समाज और राष्ट्र के सशक्तिकरण का ही था।

डा़ अम्बेडकर के चिन्तन और दृष्टि को समझने के लिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि वे अपने चिन्तन में कहीं भी दुराग्रही नहीं हैं। उनके चिन्तन में जड़ता नहीं है। अम्बेडकर का दर्शन समाज को गतिमान बनाए रखने का है। विचारों का नाला बनाकर उसमें समाज को डुबाने-वाला नहीं है।

अम्बेडकर मानते थे कि *समानता के बिना समाज ऐसा है, जैसे बिना हथियारों के सेना।*

समानता को समाज के स्थाई निर्माण के लिए धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक तथा अन्य क्षेत्रों में लागू करना आवश्यक है।

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