बाल संस्कार

डॉक्टर जी का ध्येयनिष्ठ जीवन

*श्रुतम्-153*

*डॉक्टर जी का ध्येयनिष्ठ जीवन*

डॉक्टर जी के मन में संघ की कल्पना निश्चित हो चुकी थी । अब उसे विचार जगत से व्यवहार जगत में लाना था। उसका सूत्रपात उन्होंने विजयदशमी के शुभ मुहूर्त पर करने का तय किया तदनुसार 1925 के दशहरे के दिन अपने घर में 15-20 लोगों को इकट्ठा करके उन्होंने सबसे कहा कि “हम लोग आज से संघ शुरू कर रहे हैं “।

प्रारंभ की इस बैठक में श्री भाऊ जी कावरे, श्री अन्ना सोहानी ,श्री विश्वनाथ राव ,श्री बालाजी खुद्दार ,बापूराव आदि उपस्थित थे।

जब कोई नई संस्था बनती है तो पहले ही दिन उसका संविधान कार्यालय नीति नियम आदि का विचार और समाचार पत्रों में खबरें दी जाती है । परंतु संघ के आरंभ में इन सब चीजों का अभाव रहा ।

विजयदशमी के दिन केवल दो ही बातें बीज रूप में निश्चित हुई थी पहले हिंदू राष्ट्र के पुनरुत्थान की डॉक्टर जी के मन की महत्वाकांक्षा तथा दूसरी उस को साकार करने के लिए समर्पित किया हुआ डॉक्टर जी का ध्येयनिष्ठ जीवन।

प्रारंभ में रविवार को इतवार दरवाजा प्राथमिक शाला के मैदान में एकत्रीकरण शुरू हुआ । संघ का बाहरी रूप अखाड़े जैसा ही था । पहली बार 1926 की अप्रैल में रामनवमी के मेले पर संघ के सदस्यों ने रामटेक के मेले में भारी भीड़ को अनुशासित करना और अन्य ने व्यवस्था करके सेवा कार्य प्रारंभ किया । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम अत्यंत विचार पूर्वक निश्चित किया गया था । संस्था का नामकरण हो जाने के बाद वेश आदि का चिंतन हुआ। नए-नए स्वयंसेवको की भर्ती के कारण इतवार दरवाजा प्राथमिक शाला का आंगन छोटा पड़ने लगा तो सफाई करके मोहिते का बड़ा में व्यायामशाला शुरू हुई ।

आज्ञा बनाने का काम श्री अन्ना सोहानी ने बड़ी सफलता के साथ किया गया आज्ञाओ में मराठी, हिंदी और संस्कृत भाषा का आधार लिया गया ।

सारे कार्यक्रमों के अंत में प्रार्थना भी की जाती थी  जिसमें एक पद मराठी और एक पद हिंदी का हुआ करता था ।

जब शाखा का कार्य नागपुर क्षेत्र में पर्याप्त बढ़ गया तो इसे आसपास के क्षेत्र तक फैलाने के लिए उन विद्यार्थियों का उपयोग हुआ जो उच्च अध्ययन के लिए बाहर जाना चाहते थे। इसी प्रकार अपनी पढ़ाई करते करते संघ कार्य को भी करना।

इससे डॉक्टर जी के जीवन काल में ही 1940 तक देश के सभी प्रांतों में संघ का कार्य विस्तृत हो गया।

 

 

 

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