बाल संस्कार

देवी माँ

देवी माँ 
सुबह-सुबह अखबार की चटपटी ख़बरों पर नज़र डाल ही रही थी कि सुमी बाई ने परदे के पीछे से झांककर पूछा –
” भाभीजी, मैं हर महीने आपके पास जो रुपये जमा करती थी वो आज मुझे चाहिए। “
” हाँ ले लो, पर आज ऐसी अचानक क्या जरुरत पड़ गई ? “
सुमि बोली – ” भाभीजी, मेरे गाँव की देवी को चुनरी और पूरा सुहाग चढ़ाना है। गाँव में हर कोई चढ़ाता है पर मेरे पास कभी इतने रुपये नहीं रहे। वो तो मैं थोडा-थोडा
आपके पास जमा करती रही तो अब पूजा चढ़ा पाउंगी। “
बरसों की साध पूरी हो पाने की आशा से सुमी का चेहरा ख़ुशी से दमक रहा था। दो दिन की छुट्टी का कह सुमी चली गई।
दुसरे दिन सुमि की छुट्टी याद कर, अख़बार में साड़ियों और गहनों के आकर्षक विज्ञापनों का मोह छोड़ किचन में जाने ही वाली थी कि सुमी की आवाज़ आई – ” भाभीजी। “
मैंने चोंककर देखा, दरवाजे पर सुमी खड़ी थी। मैंने ख़ुशी मिश्रित आश्चर्य से पूछा – ” अरे सुमी तुम ! तुम तो देवी को सुहाग चढ़ाने गाँव गई थी न। फिर क्या हुआ ? “
सुमी पास आकर बैठ गई। बोली – ” गई तो थी पर एक ऐसी घटना घटी कि रास्ते से ही वापस लौटना पड़ा। “
” ऐसी क्या घटना घटी कि तुम अपनी पूजा भी न चढ़ा सकीं। ?
सुमी बोली – ” पता नहीं देवी माँ क्या चाहती थीं ? कल शाम बस से गाँव के लिए निकले ही थे कि एक युवती और उसकी माँ जल्दी-जल्दी बस में चढ़े। मेरे पास थोडीसी
जगह थी , युवती मेरे पास आकर बैठ गई। युवती की माँ मुझसे बोली – मेरी बेटी ससुराल जा रही है, इसके बापू बीमार हैं इसलिए अकेली ही भेज रही हूँ। अगर आप इसका
जरा ख्याल रखेंगी तो मैं निश्चिन्त हो जाउंगी। मैंने स्नेह से लक्ष्मी के सिर पर हाथ फेरकर कहा – ” आप चिंता न करें मैं भी उसी गाँव की हूँ इसे सुरक्षित घर पहुंचा दूँगी। “
” रास्ते में बातचीत करते हुए वह मुझसे काफी हिलमिल गई। अभी एक घंटा ही हुआ था कि एक बैलगाड़ी को बचाने में बस पेड़ से जा टकराई। लक्ष्मी का सिर खिड़की
से टकराया और खिड़की का शीशा टूटकर उसके माथे में धंस गया। माथे से खून तेजी से बहने लगा। लक्ष्मी आधी बेहोशी की हालत में थी। मैं तुरंत उसे लेकर उसी गाँव में
उतर गई। कुछ लोगों की मदद से उसे अस्पताल में भरती कराया। लक्ष्मी को टाँके लगाए, ग्लुकोस की बोतल चढ़ाई। अस्पताल वालों ने हज़ार रुपये मांगे। मैं दुविधा में पड़
गई। एक तरफ मेरी बरसों की साध थी, दूसरी और वह मासूम अपनी नीम बेहोशी की हालत में थी। या तो मैं पूजा चढ़ती या फिर उस मासूम का इलाज करवाती। मैं मन ही
मन गाँव की देवी माँ का स्मरण करने लगी। अचानक मुझे लगा जैसे देवी माँ का चेहरा लक्ष्मी के चेहरे में बदल गया और देवी माँ कहने लगी – सुमी तुम्हारी तरफ से मुझे
सुहाग की पूजा मिल चुकी है। किसीकी तकलीफ में मदद करना ही सच्ची पूजा है। “
” बस फिर मैंने लक्ष्मी का इलाज करवाया। उसकी माँ को बुलाकर लक्ष्मी को सोंपा। लक्ष्मी की माँ पैसे देने लगी पर मैंने मन ही मन गाँव की देवी को प्रणाम किया और
रुपये लेने से इंकार कर दिया और वापस लौट आई। मैंने ठीक किया न भाभीजी ? “
मैं अवाक् हो सुमी का चेहरा देखती रह गई। वह एक अनपढ़ महिला होकर कितने साधारण तरीके से एक असाधारण बात कह गई और मन में यह प्रेरणा जगा गई कि
किसी दुखी इन्सान का दुःख दूर करना ही सच्ची पूजा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *