बाल संस्कार

दौलत सिंह

स्वाधीनता का अमृत महोत्सव

मध्यभारत के गुमनाम नायक (Unsung Heroes) ……

दौलत सिंह

दतिया रियासत में बहने वाली सिंध तथा पहूज नदियों के बीहड़ क्रांतिकारियों के अच्छे आश्रय-स्थल थे। सेंवढ़ा, नदीगाँव, इन्दुरखी आदि गाॅवों से इन्हें रसद आदि मिलती रहती थी। दबोह निवासी दौलतसिंह कछवाहा तथा बरजोर सिंह पवार (बिलाया) ने दतिया राज्य के पूर्वी भाग में क्रांति की ज्वाला फैलाई। उस समय दतिया रियासत का शासन प्रबंध, दतिया राज्य की रीजेन्ट रानी के हाथ में था क्योंकि राजा भवाानी सिंह अल्प-वयस्क थे। ब्रिटिष सरकार ने दतिया रियासत के राजा विजयबहादुर की मृत्यु के बाद रानी तथा अन्य सरदारों के चहेते अर्जुनसिंह को गद्दी न देकर, राजा विजयबहादुर द्वारा गोद लिये गये दत्तक पुत्र भवानी सिंह को उत्ताराधिकारी की मान्यता प्रदान की थी। तभी से दतिया रियासत के सरदारों में दो दल हो गये थे। ब्रिटिष सरकार से असंतुष्ट दल बौखला उठा और धीरे-धीरे क्रांति की ओर बढ़ने लगा। इनमें दबोह निवासी दौलत सिंह प्रमुख थे जिसका परम सहयोगी बिलाया (कोंच) निवासी बरजोर सिंह, दौलत सिंह का पिता हरचन्दसिंह उर्फ चिमनाजी क्रांति के समय इन्दुरखी आ बसा था और बरजोर सिंह के पिता का नाम था रूकमांगद पवार।

मई 1858 में भीषण गर्मी में दौलतसिंह अपने एक सौ साथियों के एक एक तोप के साथ इन्दुरखी में पडा़व डाले था और बरजोर सिंह ने तालगाॅव (दबोह) के असरफ खाॅ सवार को 9 मई 1858 को मार डाला था। लेकिन ब्रिटिश फोर्स उसे पकड़ नहीं सकी थी जब ब्रिटिश फोर्स का उस पर काफी दबाव पड़ने लगा तो वह 6 मई को महौनी चला गया। ब्रिटिश फोर्स को इन्दुरखी से खाली हाथ लौटना पड़ा। ब्रिटिश फोर्स के, इन्दुरखी से कूच करने के बाद दौलतसिंह ने इन्दुरखी पर अपना पड़ाव डाल दिया।

दौलतसिंह तथा बरजोर सिंह अपनी व्यूह रचना इस प्रकार करते थे कि जब भी इन्हें किसी जगह पर हमला बोलना होता तो उस समय इन सबकी सम्मिलित फोर्स में छः सात हजार पैदल, तीन सौ सवार इकट्ठे हो जाते थे। दबोह में दतिया रियासत की सुरक्षा फोर्स के कमांडिंग आॅफीसर ने बरजोरसिंह से अनुरोध किया कि वह दबोह को छोड़ दे। इस पर उसने उत्तर दिया कि जब तक अंग्रेजी राज्य का अमला दतिया रियासत में रहेगा तब तक क्रांतिकारी गतिविधियाँ जारी रहंेगी।

दौलत सिंह तथा बरजोर सिंह एवं इनके साथियों ने मिलकर 2 जुलाई को, कोंच को, ब्रिटिश सत्ता से छीन लिया। वहाॅ से कोंच के प्रबन्धक, गुरसराय के जागीरदार के पुत्र और उसके 500 साथियों को वहाँ से भाग जाना पड़ा । सिंध नदी के पूर्व से इन क्रांतिकारियोंको ब्रिटिश फोर्स हटा नहीं सकी।

जालौन जिला में इन क्रांतिकारियोंका आन्दोलन इतना व्यापक हो गया कि झांसी के कमिश्नर ने बताया कि कछवाहागढ़ तथा पश्चिमी जालौन जिला लगभग का पूरा क्रान्तिकारियों के हाथ में चला गया है जिनके अगुआ थे – दौलत सिंह तथा बरजोर सिंह।

क्रान्तिकारियों ने दबोह को चारों ओर से घेर लिया था। एक ओर दौलतसिंह तो दूसरी ओर बरजोरसिंह अपने साथियों सहित पड़ाव डाल हुए थे। तीसरी तरफ जगजीतसिंह बुन्देला तथा चैथी ओर जगजीत (भसनेह) अपने-अपने साथियों के साथ पड़ाव डाले हुए थे। मिलिट्री मुख्यालय से कैप्टन आसबर्न को आदेश मिला कि वह दौलत सिंह पर हमला बोले। तद्नुसार कैप्टन आॅसबर्न ने अपना अभियान तेज कर दिया। दौलतसिंह का क्रांतिकारी गतिविधियों का परचम इन्दुरखी परगना में लहरा चुका था।

11 नबम्बर को यूरोपियन सैनिकों का एक दस्ता, दो तोपें 50 मद्रास हार्स, 250 सिंधिया के सिपाही कैप्टन मेकमहन के नेतृत्व में दौलतसिंह, बरजोरसिंह तथा साथियों पर हमला करने की गरज से सिंध नदी की ओर भेजा गया। ये क्रान्तिकारियों की गढ़ी के फतेह करते हुए सिंध नदी की ओर बढ़ रहे थे। ब्रिटिश फोर्स का मकसद था कि इन क्रान्तिकारियों को नष्ट किया जाय।

जनरल नेपियर से आदेश मिलने पर, कैप्टन मेक्लियन एक पल्टन के साथ क्रान्तिकारियों से मुकाबला करने के लिए चल पड़ा। इस मुठभेड़ में दौलतसिंह के 50 आदमी मारे गये। दूसरी ओर मेजर सिन्जे अपनी मिलेट्री पुलिस को लेकर बरजोरंिसह से भिड़ गया। कैप्टन टर्नन अपनी साप्ताहिक रिपोर्ट में बताता है कि ये सभी क्रान्तिकारी दतिया तथा समथर राज्यों के ही हैं जिन्हें इन्हीं राज्यों से सहयोग मिलता है, विशेषकर शस्त्रास्त्र, गोला बारूद आदि। 12 नवम्बर को, ब्रिटिश फोर्स तथा क्रांतिकारियों से मुठभेड़ हो ही गयी जिसमें सेंवढ़ा के किलेदार (खलकसिंह दौआ) का भतीजा मारा गया। फिर 10 दिसम्बर 1858 को ब्रिटिश सेना ने क्रान्तिकारियों को पीछे खदेड़ दिया। इस मुठभेड़ में अनेक क्रान्तिकारी मारे गये और अनेक भाग खड़े हुए तथा जंगल में शरण ली।’’

कछवाहागढ़, जालौन, दतिया तथा समथर के इलाकों में क्रान्तिकारियों के जोरदार अभियान के आगे ब्रिटिश सरकार बेबस थी। प्रमुख क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए सरकार ने समय-समय पर इनाम की घोषणा की। दौलतसिंह और बरजोरसिंह पर दो-दो हजार रूपये और दबोह के चिमनाजी पर एक हजार रूपये का इनाम रखा गया।

17 दिसम्बर 1857 को ब्रिटिश सैनाधिकारी ब्रिगेडियर मेकडफ ने, दौलतसिंह तथा बरजोरसिंह, पर जो संेवढ़ा (दतिया) के पास सिंध नदी के बीहड़ में थे, हमला बोला। इस हमले में अनेक क्रान्तिकारी मारे गये। दो कमांडिंग आॅफीसरों ने बरजोरसिंह तथा उसके साथियों पर हमला करने की गरज से एक बड़ी सैनिक टुकड़ी के साथ मार्च किया जिसमें रायल आर्टीलरी (सभी रेंक), नौ पाउंडर क्षमता की एक तोप, चैबीस पाउंडर क्षमता की हाॅविट्जर तोप और 19वीं रेजीमेन्ट मद्रास नेटिव इन्फेन्ट्री थी। ये लोग 15 से 18 जनवरी 1859 तक बरजोरसिंह पर धावा बोलते रहे। 6 अप्रैल 1859 को दौलत सिंह तथा बरजोरसिंह की मुठभेड़ ब्रिटिश फौज से मऊ महौनी के जंगल में हो गयी। वहाँ से इन क्रांतिकारियों को पीछे हटना पड़ा। क्रान्तिकारी भागकर ग्वालियर राज्य की सीमा में प्रविष्ट हो गये।

4 सितम्बर 1859 की बात है, बरजोरसिंह पर कैप्टन आसबर्न ने हमला बोला। इस हमले के सामने बरजोरसिंह ठहर नहीं सका। उसे भागकर मऊ माहौनी में शरण लेना पड़ी। इस मुठभेड़ में ब्रिटिश फोर्स ने बरजोरसिंह के चालीस साथियों को मार गिराया, उसकी दो तोपें भी छीन ली, तथा सभी शस्त्रास्त्र एक गोला बारूद भी छीन लिया। डिप्टी मजिस्ट्रेट अपने पत्र में आगे यह भी बताता है कि ‘बरजोर तथा दौलतसिंह बड़े बलशाली एवं फुर्तीले हैं। वे भाण्डेरी परगना (झांसी) पर कभी-भी हमला कर सकते हैं।

बरजोरसिंह तथा दौलतसिंह ने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों से सरकार के नाक में दम कर रखा था। कमिश्नर झाँसी अपने 13 अक्टूबर के पत्र में बताता है कि इन दोनों ने के एक बड़े दल के रूप में क्रान्तिकारियों को एकत्रित कर लिया है। बरजोर सिंह के दल में बन्दूकचियों के अलावा कई अन्य क्रान्तिकारी भी शामिल थे।

पालिटिकल एजेन्ट ग्वालियर अपने पत्र में गवर्नर जनरल के एजेन्ट को बताता है-‘क्रान्तिकारी के दो प्रमुख नेता दौलतसिंह तथा बरजोरसिंह हैं, जिनके साथ दस से बारह हजार क्रान्तिकारी हैं। वे फिर से ग्वालियर, दतिया, समथर, कछवाहागढ़ के सीमावर्ती इलाके में प्रविष्ट हो गये हैं, और वहीं से वे दतिया राज्य में आ जाते हैं, इन क्रांतिकारियों को पकड़ने की गरज से कैप्टन स्मिथ की फोर्स संेवढ़ा पहुँची तथा वहाँ पर गत 23 तारीख को बरजोरसिंह तथा उसके साथियों की ब्रिटिश फोर्स से जोरदार मुठभेड़ हुई जिसमें दतिया की फोर्स को हानि उठाना पड़ी।

दौलतसिंह तथा बरजोरसिंह का आतंक 1862 तक भयंकर रूप से व्याप्त था। फरवरी 1862 में कछवाहागढ़, इलाका से लगभग दो सौ से पाँच सौ क्रान्तिकारी सेंवढ़ा में जमा हो रहे थे। इस दल में धौलपुर के ठाकुर के नेतृत्व में पचास आदमी भी इन क्रान्तिकारियों के साथ जा मिले। दौलतसिंह तथा बरजोरसिंह भी, पहूज तथा सिंध नदियों की घाटी में उन दिनों विचरण कर रहे थे।

बरजोरसिंह तथा दौलतसिंह को मालूम हुआ कि सेंवढ़ा का किलेदार राव खलकसिंह दौआ, ब्रिटिश सरकार तथा दतिया राज्य के विरूद्ध ्क्रांतिकारिया गतिविधियाॅ चला रहा है और किलेदार को तीर्थयात्रा के नाम पर दतिया राज्य से पलायन करना पड़ा है। इन दोनों क्रान्तिकारी नेताओं को जब इस षडयंत्र का पता चला तो उन्होंने राव खलकसिंह दौआ से संबंध स्थापित करने की बात सोची क्योंकि खलकसिंह दौआ ही दतिया के उत्तर में क्रांति की ज्वाला प्रज्वलित किये हुए था। दौलतसिंह और बरजोरसिंह ने अपने क्षेत्र कछवाहागढ़ से दो सौ सशस्त्र क्रान्तिकारी अपने क्षेत्र के गाँवों से सेंवढ़ा भेज दिये। जब ये क्रान्तिकारी सेंवढ़ा आ गये तो धोलपुर के ठाकुर ने भी चालीस पचास सशस्त्र क्रान्तिकारी संेवढ़ा भेज दिये। उस समय दौलतसिंह तथा बरजोरसिंह पास ही पहूज नदी के खन्दकों में पड़ाव डाले हुए थे तथा इस बारे में नियंत्रण भी बनाये हुए थे।

 

 

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