बाल संस्कार

धर्मचक्र प्रवर्तनाय

श्रुतम्-79

धर्मचक्र प्रवर्तनाय

यह भारत की लोकसभा का ध्येय वाक्य है।
महात्मा गौतम बुद्ध को जब आत्म बोध हो गया इसके पश्चात उन्होंने वाराणसी के निकट सारनाथ में अपने शिष्यों को धर्म के आठ सूत्र बताए जिन्हें अष्टांगिका या अष्टांगिक मार्ग कहा जाता है ।
बुद्ध के उपदेश देने के इस कार्य को ही धर्मचक्र के आरम्भ का अथवा प्रवर्तन का सूचक माना गया।
और इसे एक चक्र में आठ तीलियों के रूप में दर्शाया जाने लगा और इसे धर्म चक्र का नाम दिया गया।
बुद्ध ने बाद में अनुयायी के लिए २४ आवश्यक गुण निर्धारित किये जैसे धैर्य , श्रद्धा ,आत्म नियंत्रण आदि, इन्हें भी बाद के धर्मं चक्र में २४ आरियों के प्रतीक रूप में दर्शाया जाने लगा।
धर्म चक्र का किसी न किसी रूप में अंकन एशिया के उन सभी देशों में मिलता हैं जहाँ बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार हुआ ,जैसे चीन ,मंगोलिया कम्बोडिया बर्मा इत्यादि।
भारत में जैन धर्म और सनातन या हिन्दू धर्म में भी चक्र को संसार और धर्म के अनवरत चलने वाले काल चक्र के रूप में दर्शाया गया है।
अशोक के प्रस्तर लेखों (३०० बीसीई ० में भी धर्म चक्र है और अशोक स्तम्भ में यह चक्र २४ आरियों या तीलियों का है । इसे ही भारत के राष्ट्रीय ध्वज में अपनाया गया है।
भारत में बौद्ध अनुयायी धर्म चक्र प्रवर्तन को एक वार्षिक उत्सव के रूप में भी उत्साह से मनाते हैं।

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