श्रुतम्-61
धैर्य एवं वीरव्रत

समाज संगठन का कार्य करते समय अत्यधिक धैर्य की आवश्यकता होती है। यदि ऐसा न हो, तो प्राय: काम बिगड़ जाता है। इस बारे में शृंगेरी पीठ के शंकराचार्य जी से संबंधित एक कथा श्री गुरुजी सुनाते थे।
शृंगेरी पीठ के निकट स्थित एक टीले पर प्रसिद्ध शिवमंदिर है। एक बार पूज्य शंकराचार्य जी वहाँ पूजा कर रहे थे। अचानक एक भयंकर नाग फुंकारता हुआ वहाँ आ पहुँचा। उनके साथ पूजा कर रहे शिष्य भयभीत हो गये। उन्होंने इशारे से शंकराचार्य जी को नाग के बारे में बताया।
शंकराचार्य जी विचलित नहीं हुए। पूजा सामग्री में दूध से भरी एक कटोरी भी थी। उन्होंने वह नाग के सामने रख दी। नाग दूध पीकर वहाँ से चला गया। सब शिष्य आश्चोर्यचकित रह गये।
श्री गुरुजी की मान्यता थी कि संकट के समय धैर्य रखकर रास्ता निकालना तथा अपनी साधना करते रहना ही वीरव्रत है। ऐसे वीरव्रत और धैर्य से ही लक्ष्य की प्राप्ति होती है।