बाल संस्कार

नन्हा क्रान्तिकारी – दत्तू रंगारी

नन्हा क्रान्तिकारी – दत्तू रंगारी

घुट्टी में जो राष्ट्रभक्ति का पान किया करते हैं।

स्वतंत्रता अनमोल समझ बलिदान दिया करते हैं।

15 अगस्त और 26 जनवरी पर तिरंगा तो हम सभी फहराते हैं और बच्चों को मिलती है झण्डा फहराने के बाद मिठाई, लेकिन यह मिठाई खाने का अवसर जिनके कारण आया उनमें आप जैसे वे बच्चे भी थे जिन्हें तिरंगा फहराकर मिठाई नहीं मिली, गोली खानी पड़ी। पर उन्होंने तिरंगा फहराया और बड़े अभिमान के साथ फहराया। आजादी के पहले के दो-ढाई दशकों का वातावरण ही कुछ ऐसा था कि ‘वन्देमातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ देश के बच्चे-बूढ़े सभी गर्व से कहते थे। ये नारे नहीं, स्वतंत्रता की चेतना के सिद्ध मंत्र बन चुके थे। 1857 की क्रांति के पश्चात् यह पहली बार था जब बच्चा-बच्चा आजादी के लिए मचल उठा था। ऐसे वातावरण में 16 अगस्त 1929 को मैसूर (कर्नाटक) के बेलगाँव जिले के बेल हुंगल ग्राम में एक ऐसे बालक का जन्म हुआ, जिसकी बाल लीलाएँ ही यह बता रही थीं कि यह संभवतः पूर्व जन्म का महान देशभक्त रहा होगा जो एक बार फिर जन्मा है अपना अधूरा काम अर्थात् भारत माता की मुक्ति का प्रयत्न पूरा करने। पिता लक्ष्मण रंगारी ने उसका नामकरण किया दत्तू रंगारी। बचपन में पिता कहते ‘वन्देमातरम्’। लोग उसे ‘नन्हा क्रांतिकारी’ ही बुलाते।

अवस्था के साथ-साथ दत्तू घर और पाठशाला में देशभक्ति का पाठ पढ़ता गया। वह सुनता रहता था स्वातन्त्र्य समर के बलिदानी वीरों की गाथाएँ, दुहराता रहता राष्ट्रभक्ति के गान और देखा करता अंग्रेजी अत्याचारों से भारतमाता की मुक्ति के स्वप्न। अध्यापक और अभिभावक एक ही ध्येय से बच्चों के चरित्र को गढ़ने में सतर्क भूमिका निर्वाह करें तो बच्चे निस्संदेह असाधारण कर्तव्यवान बन जाते हैं। दत्तू को देशसेवा की ऐसी लगन लगी कि वह बचपन में ही क्रांतिकारियों के गुप्त संदेश यथास्थान पहुँचाने लगा। एक तो वह था भी बड़ा निडर, दूसरे अंग्रेजों के प्रति उसके मन में भरपूर घृणा थी। वह उनके विरुद्ध कुछ भी करने को आतुर रहता। बच्चा होने से वह अंग्रेजी शासन तंत्र की दृष्टि से भी बचा रहता। इतनी कम आयु के बच्चे पर कोई क्या संदेह करता? दतू बहुत चतुर व चपल था। अंग्रेज सिपाहियों को छकाना उसका मनपसंद खेल बन चुका था। 13 वर्ष का होते-होते उसे लुकछुप कर नहीं, खुलेआम भी अंग्रेजी प्रशासन को चुनौती देने का सुअवसर मिल गया। यह अवसर आया 23 अगस्त 1942 को बेल हुंगल में भारत छोड़ो आन्दोलन के निमित्त निकल रहे जुलूस में। उसने अपने मित्रों को इकट्ठा किया और जुलूस में जाने की योजना बना डाली।

दत्तू अपनी बालक टोली के साथ हाथ में तिरंगा था जुलूस में आगे-आगे चल रहा था। उसकी स्वाभिमानी चाल से अच्छे-अच्छे लड़ाके भी ईर्ष्या करें ऐसी गर्वीली चाल और कंठ में वन्देमातरम् का ओजस्वी घोष। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध नारों से गगन फटा जा रहा था और अंग्रेज अधिकारियों के हृदय काँप रहे थे।

पुलिस ने जुलूस रोका। फिर वही चेतावनी, ‘रुक जाओ नहीं तो जान जाएगी’ और सामने तनी बन्दूकों से जरा भी बिना डरे छोटा सा दत्तू हाथ का तिरंगा ऊँचा उठाकर गरजा “हम नहीं रुकेंगे। हम भारत माँ के बहादुर बेटे हैं, कायर नहीं।”

“हम आखिरी चेतावनी देते हैं – लौट जाओ।” पुलिस दल का नायक फिर चिल्लाया।

“देश की राह पर बढ़े कदम पीछे नहीं हटेंगे। वन्देमातरम्।” उसे करारा उत्तर मिला और फिर तड़-तड़-तड़-तड़ गोलियों की बरसात होने लगी।

वीर दत्तू ने छाती में गोली खाई पर हाथों का तिरंगा न झुकने दिया। भूमि पर गिर पड़ा पर जब तक तिरंगा अपने साथी को न थमा दिया, उसने अपनी साँसें न टूटने दीं। गिरा तो पवन देवता ने उसकी देह को भारत माता की रज की पतली चादर से ढंक दिया। दत्तू के मुंह पर असीम संतोष था मानों वह माँ के आँचल की छाया में सोया हो।

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