बाल संस्कार

नर्मदा को सदानीरा बनाने का प्राण:  नर्मदा समग्र

*श्रुतम्-220*

 *नर्मदा को सदानीरा बनाने का प्राण:  नर्मदा समग्र*

भारत के हृदय स्थान में बसे मध्य प्रदेश से बहने वाली नर्मदा नदी को देश के इतिहास, भौगोलिक रचना, धर्म और पुराणों में बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है।   देश के लगभग उत्तर दक्षिण मध्य से नर्मदा बहती है। मध्यप्रदेश के पूर्वी छोर पर स्थित मैकाल पर्वत के अमरकंटक से निकलकर पूरा मध्य प्रदेश पारकर महाराष्ट्र और गुजरात के भी कुछ भागों को सिंचित करते हुए वह पश्चिम में अरब सागर में जा मिलती है। नर्मदा के जल से मध्यप्रदेश के सर्वाधिक क्षेत्रों की सिंचाई होती है। इसीलिए इसे मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी भी कहते हैं। नर्मदा सदा सलिल नदी है।  वह कभी सूखती नहीं।

वह दुनिया की सबसे पुरानी नदियों में से एक है। उसके किनारे पर अतीत में डायनोसोर के अवशेष भी मिले थे। नर्मदा के किनारे कई पौराणिक राजा, महाराजा, ऋषि-मुनियों का निवास था। ऐतिहासिक काल में नर्मदा का बड़ा महत्व रहा है और आज भी नर्मदा नदी का महत्व सर्वविदित है। पूरी दुनिया में नर्मदा ही एक ऐसी नदी है, जिसकी परिक्रमा करने का धार्मिक महत्व है।

मध्य प्रदेश के लोगों में नर्मदा नदी का स्वरूप मां से कदापि कम नहीं है। लोग उसे बड़े प्यार, आदर और श्रद्धा के साथ *नर्मदा मैया* कहते हैं। उनके दिन की शुरुआत और समाप्ति *नर्मदे हर* के स्वाभाविक स्मरण से होती है।

नर्मदा के किनारे कई बड़े शहर बसे हैं। कई बड़े उद्योग शुरू हुए हैं। देश के महत्वाकांक्षी सरदार सरोवर से लेकर सबसे अधिक बांध नर्मदा नदी पर बांधे गए हैं। कई धार्मिक स्थान भी नर्मदा के किनारे पर है।

यही कारण है कि नर्मदा को पौराणिक काल से पवित्र माना जाता रहा है किंतु नर्मदा का जल अब प्रदूषित होने लगा है। इस प्रदूषण को समय होते ही रोकने के लिए नर्मदा का ऐतिहासिक, पौराणिक और धार्मिक स्वरूप बनाए रखने के लिए मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की एक स्वयंसेवी संस्था

*नर्मदा समग्र* गत कुछ वर्षों से बहुत प्रभावी ढंग से काम कर रही है।

*नर्मदा समग्र* की संकल्पना एक स्वयंसेवक, राज्यसभा सदस्य समाजसेवी और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय अनिल माधव दवे तथा उनके साथियों की है। मध्य प्रदेश के वरिष्ठ चित्रकार, नर्मदा प्रेमी और परिक्रमावासी अमृतलाल वेगड़ और अन्य कई नर्मदा प्रेमियों को साथ लेकर अनिल दवे ने नर्मदा समग्र को आकार दिया। स्वयं दवे जी ने नर्मदा नदी की परंपरा के अनुसार पैदल और बाद में विमान और पावर बोट द्वारा उसकी परिक्रमा की। इस दौरान वे नर्मदा के किनारे बसे कई सत्पुरुषों के आश्रमों और छोटे बड़े मंदिरों में गए और जनजातियों आदि से स्वयं मिले तथा उनकी समस्याओं को समझा। जगह जगह पर उन्होंने नर्मदा के जल के प्रदूषण स्तर का परीक्षण किया। साथ ही नर्मदा के किनारे बने कारखानों का भी जायजा लिया।

*वर्तमान में हमें समझना होगा कि नदी भी सभी प्राणी मात्र के समान एक सजीव इकाई है। इसके किनारे पर्यावरण व सांस्कृतिक विविधता का सरंक्षण होना जरूरी है। इसके द्वारा प्रकृति और मानव में एक अटूट नाता स्थापित होता है।*

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