बाल संस्कार

 निःस्वार्थ भाव व कठोर परिश्रम से गांवों का नया जन्म

*श्रुतम्-207*

 *निःस्वार्थ भाव व कठोर परिश्रम से गांवों का नया जन्म*

 

नवंबर 1977 में आंध्र के तटवर्ती प्रदेश में 100 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से आए चक्रवात ने गांव के गांव लील लिए थे।

आंध्र प्रदेश में मुलापलम् जिले का समूचा गांव जल में विलीन हो गया था। संघ के कार्यकर्ताओं ने दीनदयाल शोध संस्थान दिल्ली के सहयोग से एक आदर्श बस्ती के रूप में उस गांव का पुनर्निर्माण किया। यह ग्राम अब दीनदयालपुरम् के नाम से जाना जाता है। इसका यह नामकरण पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पावन स्मृति में किया गया।

अब 110 घरों का यह गांव पक्के आरसीसी आकल्पन (डिजाइन) का है। गांव वालों के लिए पीने के पानी और वैज्ञानिक आधार पर बने सामूहिक शौचालय की व्यवस्था है। अन्य सुविधाएं भी है। सामुदायिक भवन, विद्यालय, मंदिर, चिकित्सा, केंद्र, बैंक और डाकघर भी है।

यहां कुछ कुटीर उद्योग है। व्यवसायिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है। जहां अधिकांशतः मछुआरे रहते हैं वहां उनके लिए मछली पकड़ने के आधुनिक संसाधन जुटाए गए।

दीनदयाल पुरम के अतिरिक्त तीन और गांवों का पुनर्निर्माण किया गया।  गुंटूर जिले में केशवपुरी ग्राम में आदवी बनादीस नामक वनवासियों का पुनर्वास किया गया।

कृष्णा जिले के माधव नगर ग्राम में अनुसूचित जाति के लोगों को पुनः  बसाया गया।

तीसरा गांव विशाखापट्टनम जिले में श्रीरामनगर है। वहां जितने भी लोगों का पुनर्वास किया गया, वे सभी अनुसूचित जातियों तथा पिछड़े वर्गों के हैं।

श्रीराम नगर प्रकल्प के बारे में दिनांक 13 जुलाई 1979 के हिंदू समाचार पत्र ने लिखा- “जो भी बस्ती देखने जाता है, वह परियोजना के प्रति संघ स्वयंसेवकों के पूरे लगाव

से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।

डेढ़ वर्ष के अपने सहचर्य में स्वयंसेवकों ने एक प्राथमिक पाठशाला प्रारंभ की और उसके 60 छात्रों को पाटी, पुस्तकें और कपड़े दिए। संघ स्वयंसेवकों ने केवल 18 माह के भीतर 90 हरिजन बच्चों को लिखना पढ़ना सिखा दिया।

भीमराव अंबेडकर के जन्मदिन के उपलक्ष्य में संघ ने अप्रैल में एक सिलाई केंद्र खोला। वहां अनेक हरिजन महिलाओं को सिलाई का प्रशिक्षण दिया गया है।

इसी बीच प्रौढ़ शिक्षा की एक अन्य महत्वपूर्ण परियोजना चालू की गई है। दिन भर के कठोर शारीरिक श्रम के बाद भी बस्ती का पुरुष वर्ग प्रौढ शिक्षा की कक्षाओं में सक्रिय सहयोग दे रहा है और ज्ञानार्जन में रुचि ले रहा है। *अपना रिक्शा लो* योजना के अंतर्गत 25 हट्टे-कट्टे  हरिजन युवकों के लिए साइकिल रिक्शा की व्यवस्था बैंक से ही वित्तीय सहायता प्राप्त करा कर की गई।

*राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवको ने ये सेवा कार्य सहज, स्वाभाविक,निष्पक्ष और निःस्वार्थ भाव से किए थे।*

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *