बाल संस्कार

 *निर्भयता*

*श्रुतम्-194*

 *निर्भयता*

व्यक्ति हो अथवा समाज, और उसे ऐहिक उन्नति करनी हो अथवा पारलौकिक, उसमें निर्भयता रहना अति आवश्यक है। इसलिए श्रीमद्भगवतगीता के 16 अध्याय में देवी संपदा का विवेचन करते हुए भगवान श्री कृष्ण ने जो प्रथम गुण बताया है वह है- *अभयम्* ।

अभय अर्थात निर्भयता, डर न लगना यह स्थिति भला कैसे प्राप्त हो सकेगी? वास्तव में इस स्थिति की कल्पना ही कितना आनंद देने वाली है। मुझे किसी का भय नहीं ऐसा यदि हो सका तो?  न घर में न बाहर, न जन में  न वन में, न जीवन का न मृत्यु का, किसी का भय शेष ना रहा, ऐसा यदि हो जाए तो और यदि समग्र समाज ऐसी निर्भयता से भर गया तो पृथ्वी पर स्वर्ग उतर आएगा। निर्भयता के पीछे-पीछे निर्वैरता आएगी। निर्द्वंद वृत्ति निर्माण होगी। परस्पर प्रेम, विश्वास, सुहृदयभाव और सहकार्य का साम्राज्य चतुर्दिक फैलेगा और अखिल मानव जाति  सन्मार्गगामी होगी।

 

भय व्यक्ति सापेक्ष होता है  समान परिस्थिति में भी मनुष्य की मनोरचना के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रतिक्रिया होती हुई दिखाई देती है। यह सब कुछ उसके चिंतन और व्यवहार की परिपक्वता पर निर्भर करता है कि उसकी प्रतिक्रिया कैसी होगी?

 

भयग्रस्त अवस्था में किसी भी प्रकार की प्रगति होना असंभव हो जाता है। क्योंकि उस अवस्था में मनुष्य की बुद्धि कुंठित हो जाती है। मन की कल्पना शक्ति पंगु हो जाती है। शरीर की हलचल मंद अथवा विकृत हो जाती है।

 

*निर्भयता को धारण करके ही हम स्वयं शक्ति संपन्न बनकर भारत माता को फिर से जगद्गुरु के सिंहासन पर विराजमान कर सकते हैं अतः निर्भय बने।*

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