बाल संस्कार

पवित्र नदियां – गंगा नदी

*श्रुतम्-262*

 *पवित्र नदियां*

अनेक पवित्र नदियां अपने पवित्र जल से भारत माता का अभिसिंचन करती है। संपूर्ण देश में इन नदियों को आदर व श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। इनके पवित्र तटों पर विभिन्न धार्मिक व सांस्कृतिक आयोजन किए जाते हैं। प्रत्येक हिंदू इन के जल में डुबकी लगाकर अपने को धन्य मानता है। ये नदियां भारत के उतार-चढ़ाव की साक्षी है। हमारी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में असंख्य  तीर्थ इन नदियों के तटों पर विकसित हुए।

*1.गंगा नदी*

गंगा भारत की पवित्रतम नदी है। *सूर्यवंशी राजा भगीरथ* के प्रयासों से यह भारत भूमि पर अवतरित हुई।

उत्तर प्रदेश के *उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री शिखर पर गोमुख* इसका उद्गम स्थान है। गंगोत्री के हिम से पुण्यसलिला गंगा अनवरत जल प्राप्त करती रहती है।

यह गंगा जल की ही विशेषता है कि अनेक वर्षों तक रखा रहने पर भी यह दूषित नहीं होता। गंगाजल का एक छींटा पापी को भी पवित्र करने की क्षमता रखता है।

गंगा के तट पर *हरिद्वार, प्रयाग, काशी, पाटलिपुत्र* आदि पवित्र नगर श्रद्धालु जनों को आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं।

गंगा *भागीरथी, जाह्नवी, देवनदी* आदि नामों से भी पुकारा जाती है।

यमुना, गंडक, कोसी के जल को समेटते हुए गंगा समुद्र में मिलने से लगभग 300 किलोमीटर पहले ही कईं  शाखाओं में विभक्त होकर *ब्रह्मपुत्र के साथ मिलकर विश्व के सबसे बड़े त्रिभुजाकार तटवर्ती मैदान (डेल्टा)* का निर्माण करती है।

आज के *बांग्लादेश में इसे पद्मा* नाम से जाना जाता है। कोलकाता से लगभग 125 किलोमीटर दक्षिण में गंगा सागर नाम का पवित्र स्थल है। यहीं पर कपिल मुनि का आश्रम था, जहां सगर पुत्रों की भस्मी को आत्मसात कर गंगा ने उनका उद्धार किया।

गोमुख गंगोत्री से *1450 किलोमीटर* लंबी यात्रा पूर्ण कर पतित पावनी गंगा गंगा सागर में मिल जाती है।

हिंदू की मान्यता है कि गंगा के किनारे किए गए पुण्य कर्मों का फल कई गुना अधिक हो जाता है। गंगा तट पर पहुंचकर पापी के हृदय में अच्छे भाव का संचार होने लगता है।

आषाढ़, कार्तिक, माघ, वैशाख की पूर्णिमा, जेष्ठ शुक्ल दशमी, माघ शुक्ल सप्तमी तथा सोमवती अमावस्या को गंगा में स्नान करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।

ऋग्वेद, महाभारत, भागवत पुराण, रामायण आदि में गंगा का महात्म्य  विस्तार से वर्णित है। सच्चाई तो यह है कि गंगा सब तीर्थों का प्राण है।

*भागवत पुराण के अनुसार गंगावतरण वैशाख शुक्ल तृतीया को तथा हिमालय से मैदान में निर्गम जेष्ठ  शुक्ल दशमी को हुआ।*

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