बाल संस्कार

 पुष्कर सरोवर

*श्रुतम्-276*

 *पुष्कर सरोवर*

 

राजस्थान में अजमेर शहर से 14 किलोमीटर दूर पुष्कर सरोवर है। इस सरोवर का संबंध *भगवान ब्रह्मा* से है। यहां *ब्रह्माजी का एकमात्र मंदिर* बना है। पुराणों में इसके बारे में विस्तार से उल्लेख मिलता है।

यह कई प्राचीन ऋषियों की तपोभूमि भी रहा है।

यहां *विश्व का प्रसिद्ध पुष्कर मेला* लगता है, जहां देश-विदेश से लोग आते हैं। पुष्कर की गणना *पंच तीर्थों* में भी की गई है।

पुष्कर के उद्भव का वर्णन *पद्मपुराण* में मिलता है। कहा जाता है कि ब्रह्मा ने यहां आकर यज्ञ किया था। पुष्कर का उल्लेख रामायण में भी हुआ है। विश्वामित्र के यहां तप करने की बात कही गई है। अप्सरा व मेनका यहां के पावन जल में स्नान के लिए आई थीं। *सांची स्तूप दानलेखों* में इसका ‍वर्णन मिलता है। पांडुलेन गुफा के लेख में, जो ई. सन् 125 का माना जाता है, उषमदवत्त का नाम आता है। यह विख्यात राजा नहपाण का दामाद था और इसने पुष्कर आकर 3,000 गायों एवं एक गांव का दान किया था।

महाभारत के वन पर्व के अनुसार *योगीराज श्रीकृष्ण ने पुष्कर में दीर्घकाल तक तपस्या* की थी। सुभद्रा के अपहरण के बाद अर्जुन ने पुष्कर में विश्राम किया था।

*मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने भी अपने पिता दशरथ का श्राद्ध पुष्कर* में किया था।

*जैन धर्म की मातेश्वरी पद्मावती का पद्मावतीपुरम* यहां जमींदोज हो चुका है जिसके अवशेष आज भी विद्यमान हैं।

पुष्कर सरोवर 3 हैं- *ज्येष्ठ (प्रधान) पुष्कर, मध्य (बूढ़ा) पुष्कर और कनिष्ठ पुष्कर।* ज्येष्ठ पुष्कर के देवता ब्रह्माजी, मध्य पुष्कर के देवता भगवान विष्णु और कनिष्ठ पुष्कर के देवता रुद्र हैं।

ब्रह्माजी ने पुष्कर में कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णमासी तक यज्ञ किया था जिसकी स्मृति में अनादिकाल से यहां कार्तिक मेला लगता आ रहा है। पुष्कर के मुख्य बाजार के अंतिम छोर पर ब्रह्माजी का मंदिर बना है।

*आद्य शंकराचार्य ने संवत्‌ 713 में ब्रह्मा की मूर्ति की स्थापना* की थी। मंदिर का वर्तमान स्वरूप *गोकलचंद पारेख ने 1809 ई.* में बनवाया था।

तीर्थराज पुष्कर को सब तीर्थों का गुरु कहा जाता है। इसे धर्मशास्त्रों में 5 तीर्थों में सर्वाधिक पवित्र माना गया है।

*पुष्कर, कुरुक्षेत्र, गया, हरिद्वार और प्रयाग को पंचतीर्थ* कहा गया है। अर्द्धचंद्राकार आकृति में बना पवित्र एवं पौराणिक पुष्कर सरोवर  धार्मिक और आध्यात्मिक आकर्षण का केंद्र रहा है।

सरोवर की उत्पत्ति के बारे में किंवदंती है कि ब्रह्माजी के हाथ से यहीं पर कमल पुष्प गिरने से जल प्रस्फुटित हुआ जिससे इस झील का उद्भव हुआ। यह मान्यता भी है कि इस झील में डुबकी लगाने से पापों का नाश होता है।

सरोवर के चारों ओर *52 घाट व अनेक मंदिर* बने हैं। इनमें *गऊघाट, वराहघाट, ब्रह्मघाट, जयपुर घाट* प्रमुख हैं। जयपुर घाट से सूर्यास्त का नजारा अत्यंत अद्भुत लगता है।

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