बाल संस्कार

प्रेरक कथा 10

प्रेरक कथा 10

एक बार कुछ लोगों के बीच यह चर्चा छिड़ी कि इस संसार में सचमुच में संतुष्ट कौन है?सबसे सुखी कौन है?
शांति किसके पास है?
लोगों ने कहा, राजा ही होगा! उसके पास नौकर-चाकर हैं, सत्ता है, धन-दौलत है। तो उन्होंने राजा के पास जाकर पूछा कि क्या आप संतुष्ट हैं?
राजा ने कहा, अरे नहीं, मैं संतुष्ट कहां हूं? हमेशा चिंता लगी रहती है कि पड़ोसी राजा कहीं मेरे हमला न कर दे। डर लगा रहता है कि कोई दरबार में षड्यंत्र न करे। लोगों ने पूछा कि तब आप क्या सोचते हैं, फिर कौन संतुष्ट होगा?

राजा ने कहा, बादशाह हो सकता है। वे लोग बादशाह के पास पहुंचे और पूछा कि आप क्या संतुष्ट हैं? बादशाह ने भी वही बात कही, मुझको तो हर घड़ी राज् की ही चिंता लगी रहती है। सिर पर ताज धरने वाले को शांति कहां?

लोगों ने सोचा कि राज-पाट वालों को तो संतोष नहीं है, हो सकता है कि वह संतुष्ट हो जिसके पास कुछ खोने के लिए नहीं है। उन्होंने एक भिखारी को पकड़ा।
भिखारी बोला, कैसा मजाक करते हो भाई, मुझे तो हमेशा यह चिंता लगी रहती है
कि अगले समय का खाना कहां से आएगा?

आखिर में लोग भगवान के पास पहुंचे। भगवान ने कहा, जो मेरा भजन करता है, एक वही इस संसार के अंदर संतुष्ट है, बाकी कोई नहीं। जिज्ञासुओं ने पूछा, ऐसा क्यों?
तो बोले, क्योंकि भगवान तुम्हारे भीतर बैठा है। जब तुम संतुष्ट होते हो, बाहरी चीजों से विरक्त होते हो, तभी उसके पास तक पहुंचते हो।

यह एक कहानी है, समझाने के लिए। क्योंकि सबको मालूम है कि अगर कोई परमानंद है
तो केवल भगवान ही है। इस भौतिक जीवन में परमानंद जैसी कोई चीज तो हो नहीं सकती। लेकिन जब मैं बात करता हूं भगवान की, तो लोग अक्सर पूछते हैं कि किस भगवान की बात कर रहा हूं? यहां तो कितने सारे भगवान हैं। एक राम दशरथ का बेटा है, एक राम घट-घट में बैठा। एक राम का जगत पसारा, एक राम सब जगसे न्यारा ।।

एक बार एक जिज्ञासु ने मुझे चिट्ठी लिखी, महाराजी, यह दोहा सुना तो अच्छा लगा,
परंतु अब उलझन हो गई है। हम किस भगवान के पीछे पड़ें? मैंने जवाब लिखा कि भाई, सबसे नजदीक वाले को पकड़ो! जब पकड़ना ही है तो दूर किसलिए भागते हो? अगर जानना ही है,तो जो तुम्हारे घट में है, उसी को जानो। इस संसार में भेदभाव पैदा करने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। शर्म की बात है! जिस भगवान के नाम को जपने में आदमी को शांति मिलनी चाहिए, जिस भगवान के नाम को याद करने से ही आदमी को अपनी ‘मानवता’ का अहसास होना चाहिए, उसी भगवान के नाम पर लोग एक-दूसरे को मारने के लिए तैयार हैं,अपनी मानवता को छोड़ने के लिए तैयार हैं। क्या सचमुच में यह धर्म की प्रकृति है कि लोग एक-दूसरे स नफरत करें?

अब बदलाव का समय है। मैं तो चाहता हूं कि इस संसार में फिर दोबारा ऐसा समय
आए कि मनुष्य को अपनी मानवता याद आए। मानवता यही है कि मैं तेरे खोट
को नहीं देखूंगा, मैं तेरे अवगुण को नहीं देखूंगा, मैं तेरी अच्छाई को देखूंगा।
ऐसा नहीं कि तू किस धर्म को मानता है? बल्कि यह कि तू भगवान का बनाया है, मैं
भी भगवान का बनाया हुआ हूं। जब तक हम इस संसार में हैं, आपस में मिलकर रहें। अगर
संसार के अंदर थोड़ी-सी दया, मानवता, प्रेम और प्यार आ जाए तो ऐसी हरियाली होगी,
ऐसी हरियाली होगी कि बस पूछो मत!

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