बाल संस्कार

बचेंगे तो और लड़ेंगे

श्रुतम्-135

“बचेंगे तो और लड़ेंगे”

घायल सेनापति दत्ता जी शिंदे के सामने अहमद शाह अब्दाली का गुरु और सेनापति कुतुबशाह खड़ा सोच रहा था। उसे पूरा विश्वास था कि दत्ता जी यदि जीवित है तो अवश्य पैर पकड़कर माफी मांगेगा और तब सोचूंगा कि दत्ता जी को मार डाला जाए या बंदी बनाकर काबुल ले जाया जाए। इसी उत्साह से उसे दत्ता जी के पास आकर बड़े घमंड से खिल्ली उड़ाते हुए पूछा – “क्यों पटेल, और लड़ोगे ?”
कुतुबशाह के इस प्रश्न में घुला हुआ व्यंग इतना तीखा था कि दत्ता जी तड़प उठा।बांयी पसलियों में घुसी बंदूक की गोली को भूल सा गया उसने दाहिनी ओर करवट ली और अंगारों की जैसी दहकती आंखों से कुतुबशाह को देखा । घायल दत्ता जी की आंखों में तैर रहे निर्भयता तथा स्वाभिमान के भावों को देखकर कुतुबशाह बौखला उठा। सोचने लगा -“मराठा पिल्ला ,शेर जैसी आंखें दिखा रहा है। घायल है ; जान जा रही है; पर डरता नहीं मुझ से खौफ तक नहीं खाता। मेरा अपमान कर रहा है।”
बस, कुतुबशाह निर्लज्जलता की अंतिम सीढ़ी तक आ पहुंचा। प्रतिशोध की भावना से उसका सिर चक्कर खाने लगा । उसने दत्ता जी की शेर जैसी घूरती आंखों को देख दत्ता जी की छाती पर एक करारी लात मारी और चिढ़ाते बोला-
“क्यों पटेल !और लड़ोगे?” मरणासन्न
दत्ता जी ने बहुत ही गंभीरता के साथ करारा उत्तर दिया -“हां’ बचेंगे तो और लड़ेंगे।”
दत्ता जी शांत हो चुके थे, किंतु कुतुबशाह स्वयं को अशांत अंधड़ में घिरा अनुभव कर रहा था इसका हर झोंका उसे धिक्कार रहा था- “मियां, दत्ता जी जैसे वीर समर भूमि में हारा और मरा नहीं करते ,वे वीरगति को प्राप्त करते हैं।
“वीर बहादुर दत्ता जी के सभी भारतवासी हमेशा ऋणी रहेंगे।”

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