बाल संस्कार

बब्बर अकाली-दलीप सिंह

 बब्बर अकाली-दलीप सिंह

देशद्रोही देश के दुश्मन से भी घातक अधिक है।

राह के काँटे कुचलते जो बढ़े हम वो पथिक हैं।

“आजादी कभी गिड़गिड़ाते भीख माँगते नहीं मिलती, यह शेरों की भाँति झपट्टा मार कर छीनी जाती है।” पंजाब के होशियारपुर के आसपास एक ऐसा ही उत्कट उत्साही नवयुवकों का दल था जिसके संगठन का ये मूलमंत्र था। इसलिए यह ‘बब्बर अकाली दल’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इनका एक और सिद्धान्त था कि “राष्ट्र के बाहर के शत्रुओं की अपेक्षा घर के भेदियों से अधिक खतरा है।” वे ऐसे अंग्रेजों को स्वतंत्रता सैनिकों की गुप्त सूचनाएँ देने वालों को सूंघते फिरते और ध्यान में आते ही उन्हें यमलोक की यात्रा करवाने को तैयार रहते। वे अपने इस अभियान को ‘सुधार आन्दोलन’ कहते थे।

इसी क्षेत्र के धमियाँकलाँ गाँव के बाहर वाले जंगल से गुजर रहे पुलिस के एक गुप्तचर ने अपने साथी से कहा, “जरा संभल के। यह बागी बन्तासिंह धामियाँ का इलाका है। पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारी भी उससे पंगा नहीं लेते। सलाम कहते सामने से हट जाते हैं।” यह फुसफुसाहट चल ही रही थी कि ‘साँय’ करती एक गोली पास की झाड़ी से चली और कहने वाले को भेद गई। वह गिर पड़ा तो दूसरा जान छोड़कर भाग गया। गोली चलाने वाला था बब्बर अकाली दल का ही सदस्य चौदह साल का दलीप सिंह।

दलीप अनेक गद्दारों को अंग्रेजों की मुखबिरी के लिए मौत की सजा दे चुका था लेकिन इस बार उसे गोली चलाते एक व्यक्ति ने देख लिया और उसकी पहचान पुलिस को बता दी। 12 अक्टूबर, 1923 को बालक दलीप सिंह गिरफ्तार हुआ। उसकी गिरफ्तारी का प्रतिशोध लेने धन्ना सिंह ने प्रयत्न किया पर पुलिस के घेरे में आ गए। उन्होंने सोचा, ‘मरना तो है ही तो मरते-मरते कुछ दुश्मनों को ही समाप्त कर चलूँ।’ पुलिस अधिकारी हार्टन

और शेष पुलिसवाले जैसे ही पास आए, धन्ना सिंह की कोहनी अपनी कमर में बँधे बम पर चली और जैसे महाभारत का घटोत्कच मरते-मरते कौरवों की भारी सेना को मार गया था, धन्ना सिंह ने अपने साथ हार्टन और पाँच अन्य पुलिसवालों के चीथड़े उड़ा दिए।

दलीप सिंह को अवयस्क होने से कानूनन फांसी नहीं दी जा सकती थी अतः उस पर मुकद्दमे का नाटक मानो उसके वयस्क होने की प्रतीक्षा में ही लम्बा खींचा गया। सत्रह वर्ष का होने पर जज ने पूछा “तुम छोटे बच्चे हो।

माफी माँग लो तो फाँसी से बचोगे।”

हँसा, “माफी और हम? जज साहब, जल्दी दिलवा दीजिए मुझे फाँसी। मेरी जन्मभूमि मेरी राह देख रही होगी कि कब मैं उसकी गोद में समा जाऊँ।”

27 फरवरी 1926 का वह दिन दलीप सिंह के बलिदान से पावन हुआ। अनेक देशद्रोहियों को नरक पहुँचाकर उसने हँसते-हँसते फाँसी का फन्दा चूमा।

 

 

 

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