बाल संस्कार

  भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को नष्ट करने के लिए अंग्रेजों का अपप्रचार

*श्रुतम्-177*

    भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को नष्ट करने के लिए अंग्रेजों का अपप्रचार

अंग्रेजों का पहला जहाज भारत के सूरत शहर में पहुंचा २४ अगस्त १६०८ को. इसी जहाज से पहले ब्रिटिश डॉक्टर ने भारत की धरती पर पांव रखा. यह डॉक्टर, जहाज के डॉक्टर के रूप में अधिकारिक रूप से भारत की धरती पर आया था. अगले डेढ़ सौ वर्षों तक जहां जहां अंग्रेजों की बसाहट थी, वहां वहां, अर्थात सूरत, बाँबे (मुंबई), मद्रास, कलकत्ता आदि स्थानों पर अंग्रेजी डॉक्टर्स / नर्स और छोटे मोटे अस्पतालों की रचना होती रही.

यह चित्र बदला सन् १७५७ में प्लासी के युद्ध के बाद, जब बंगाल के एक बहुत बडे प्रदेश की सत्ता अंग्रेजों के पास आई. अब उन्हें मात्र अंग्रेज लोगों की ही चिंता नहीं करनी थी, वरन् उनकी भाषा में ‘नेटिव्ह’ लोग भी उसमें शामिल थे. संक्षेप में संपूर्ण ‘प्रजा’ की, नागरिकों के स्वास्थ्य की उन्हें चिंता करनी थी. बंगाल में पहले चिकित्सा विभाग का गठन हुआ सन् १७६४ में. इसमें प्रारंभ से ४ प्रमुख शल्य चिकित्सक (सर्जन), ८ सहायक शल्य चिकित्सक और २८ सहायक थे. किन्तु दुर्भाग्य से, बंगाल में १७६९ से १७७१ के बीच जो भयानक सूखा पड़ा, उस समय अंग्रेजों की कोई चिकित्सा व्यवस्था मैदान में नहीं दिखी. इस अकाल में एक करोड़ से ज्यादा लोग भूख से और अपर्याप्त चिकित्सा की वजह से मारे गए. १७७५ में बंगाल के लिये हॉस्पिटल बोर्ड का गठन हुआ, जो नये अस्पतालों की मान्यता देखता था.

अगले १० वर्षों में अर्थात १७८५ तक अंग्रेजों की यह स्वास्थ्य सेवाएँ बंगाल के साथ मुंबई और मद्रास में भी प्रारंभ हो गई. इस समय तक कुल २३४ (शल्य चिकित्सक) अंग्रेजों के इलाकों में काम कर रहे थे. १७९६ में, हॉस्पिटल बोर्ड का नाम बदलकर ‘मेडिकल बोर्ड’ किया गया.

सन् १८१८ में मराठों को निर्णायक रूप से परास्त कर अंग्रेजों ने सही अर्थों में भारत में अपनी सत्ता कायम की. अब पूरे भारत में उनको अपनी चिकित्सा व्यवस्था फैलानी थी. उतने कुशल डॉक्टर्स और नर्सेस उनके पास नहीं थे. दूसरा भी एक भाग था. *भारतीय जनमानस, अंग्रेजी डॉक्टर्स पर भरोसा करने तैयार नहीं था. उसे सदियों से चलती आ रही, सहज, सरल और सुलभ वैद्यकीय चिकित्सा प्रणाली पर ज्यादा विश्वास था. इसलिये अंग्रेजों ने पहला लक्ष्य रखा, भारतीय चिकित्सा पद्धति को ध्वस्त करना. इसकी वैधता के बारे में अनेकों प्रश्न खडे करना और इस पूरी व्यवस्था को दकियानूसी करार देना.*

सन् १८५७ तक इतने बडे भारत पर ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ यह निजी कंपनी ही णराज कर रही थी. १८५७ की, भारतीय सैनिकों की सशस्त्र क्रांति के बाद, सन् १८५८ से भारत के प्रशासन की बागडोर सीधे ब्रिटेन की रानी के हाथ में आ गई. अब भारत पर ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स और हाउस ऑफ लॉर्ड्स के नियम चलने लगे  और अंग्रेजों ने एक-एक करके भारतीय चिकित्सा पद्धति को ध्वस्त करना शुरू कर दिया।

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