बाल संस्कार

 भारतीय नौसेना के जनक छत्रपति शिवाजी का अंग्रेजों को सबक

*श्रुतम्-238*

 *भारतीय नौसेना के जनक छत्रपति शिवाजी का अंग्रेजों को सबक*

17 वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी के राज्यकाल में एक मजबूत मराठा नौसेना ने भारतीय जल सीमाओं की अनेकों विदेशी आक्रमणकारियों से सफलतापूर्वक रक्षा की। छत्रपति शिवाजी की नौसेना भलीभांति प्रशिक्षित थी और उनके पोत तोपों से सुसज्जित थे।

शिवाजी ने अंडमान द्वीप समूह पर निगरानी चौकियों का निर्माण कराया जहां से शत्रुओं पर निगाह रखी जाती थी। मराठा नौसेना ने कई बार अंग्रेजी, डच और पुर्तगाली नौसेनाओं पर सफलतापूर्वक हमले किये और जहाज़ों पर कब्ज़ा किया। सिद्धोजी गुर्जर, कान्होजी आंग्रे, मैनाक भंडारी और मेंढाजी भाटकर कुछ प्रमुख मराठा नौसेनानायक थे जिन्होनें अपनी वीरता और रणनीति से उस समय की बड़ी नौसेनाओं के छक्के छुड़ा दिये।

शिवाजी ने अपनी दूरदर्शिता और रणनीति से भारतीय नौसेना के इतिहास में ऐसी छाप छोड़ी कि उन्हें आधुनिक भारतीय नौसेना का जनक कहा जाता है।

राजापुर में ब्रिटिश व्यापारियों का गोदाम था। उन्होंने वहां के व्यापारियों को अपने वश और प्रलोभन में लेकर किसानों से अत्यंत अल्प दाम में वह खोपरा खरीद लिया। तब परिवहन के साधन नहीं थे। किसानों की आर्थिक क्षमता ऐसी नहीं थी कि वे अपना उत्पाद अन्य मंडी में भेजते। उन्हें भारी हानि सहनी पडी । उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज को पत्र लिखकर इस विषय में सूचित किया। शिवाजी महाराज ने तुरंत अंग्रेजों की ओर से आ रही वस्तुओं पर २०० प्रतिशत दंडात्मक आयात शुल्क लगा दिया। इससे अंग्रेजों की वस्तुओं की बिक्री घट गई। अंग्रेजों ने छत्रपति शिवाजी महाराज को पत्र लिखा कि ‘हम पर दया करें, सीमा शुल्क कम करें।’ छत्रपति शिवाजी महाराज ने तत्काल आज्ञापत्र भेजा,‘‘मैं शुल्क उठाने के लिए एक ही शर्त पर तैयार हूं। आपने हमारे राजापुर के किसानों की जो कुछ भी हानि की हैं, उसका भुगतान योग्य प्रकार से करें। तथा उस पूर्ति की प्राप्ति सूचना किसानों की ओर से प्राप्त होने के पश्चात ही मैं दंडात्मक शुल्क निरस्त करूंगा, अन्यथा नहीं।’’ दूसरे दिन से अंग्रेजों ने व्यापारियों से मिलकर उनके द्वारा सभी किसानों को उनकी वस्तुओं का उचित मूल्य तथा उसके साथ हानिपूर्ति की राशि अदा करना आरंभ किया। तदुपरांत किसानों ने छत्रपति शिवाजी महाराज को उनकी हानि की पूर्ति होने और अपनी संतुष्टि के विषय में सूचित किया। तब जाकर शिवाजी महाराज ने सीमाशुल्क निरस्त किया।

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