बाल संस्कार

भारतीय विज्ञान की उज्जवल परंपरा भाग 2

श्रुतम्-122

भारतीय विज्ञान की उज्जवल परंपरा
भाग 2

समग्र भारतीय वैज्ञानिक परंपरा को निम्नलिखित दो चरणों में बाँटकर विस्तार से अध्ययन किया जा सकता है –
1. प्राचीन भारतीय विज्ञान और
2. मध्यकालीन तथा आधुनिक भारतीय विज्ञान

भारत में वैज्ञानिक अनुसंधानों और अविष्कारों की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। जिस समय यूरोप में घुमक्कड़ जनजातियाँ बस रही थीं उस समय सिंधु घाटी के लोग सुनियोजित नगर बसाकर रहते थे। मोहन जोदड़ो, हड़प्पा, काली बंगा, लोथल, चंहुदड़ों बनवाली, सुरकोटड़ा आदि स्थानों पर हुई खुदाई में मिले नगरों के खंडहर इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। इन नगरों के भवन, सड़कें, नालियाँ, स्नानागार, कोठार आदि पक्की ईंटों से बने थे। यहाँ के निवासी जहाजों द्वारा विदेश से व्यापार करते थे। माप-तौल का ज्ञान उन्हें था। परिवहन के लिए बैलगाड़ी का उपयोग होता था। कृषि उन्नत अवस्था में थी। वे काँसे का उपयोग करते थे। काँसे के बने हथियार और औजार इसका प्रमाण है। सुनार सोने, चाँदी और बहुमूल्य रत्नों के आभूषण बनाते थे। इसका अर्थ यह हुआ कि ये लोग खनन विद्या में पारंगत थे। कठोर रत्नों को काटने, गढ़ने, छेद करने के लिए उनके पास उन्नत कोटि के उपकरण थे। ये लोग ऊनी और सूती वस्त्र बनाना जानते थे। इन लोगों की संस्कृति को इतिहासकार हड़प्पा संस्कृति के नाम से जानते थे।

वैदिक काल के लोग खगोल विज्ञान का अच्छा ज्ञान रखते थे। वैदिक भारतीयों को 27नक्षत्रों का ज्ञान था। वे वर्ष, महीनों और दिनों के रूप में समय के विभाजन से परिचित थे। ‘लगध’ नाम के ऋषि ने ‘ज्योतिष वेदांग’ में तत्कालीन खगोलीय ज्ञान को व्यवस्थित कर दिया था।

गणित और ज्यामिति का वैदिक युग में पर्याप्त विकास हुआ था। वैदिककालीन भारतीय तक गणना कर सकते थे।

वैदिक युग की विशिष्ट उपलब्धि चिकित्सा के क्षेत्र में थी। मानव शरीर के सूक्ष्म अध्ययन के लिए वे शव विच्छेदन (पोस्ट मार्टम) प्रक्रिया का कुशलता से उपयोग करते थे। प्राकृतिक जड़ी-बूटियों और उनके औषधीय गुणों के बारे में लोगों को विशद ज्ञान था। तत्कालीन चिकित्सक स्नायुतंत्र और सुषुम्ना (रीढ़ की हड्डी) के महत्त्व से भली-भाँति परिचित थे।

मौसम-परिवर्तन शरीर, में सूक्ष्मजीवों की उपस्थिति तथा रोग पैदा करने वाले आनुवांशिक कारकों आदि के सिद्धांतों को वहाँ से मान्यता प्राप्त थी। आयुर्वेद चिकित्सा-पद्धाति का बहुतायत में उपयोग होता था। आवश्यकता पड़ने पर शल्य-चिकित्सा भी की जाती थी। बाद में तो अरबों तथा यूनानियों ने भी शल्य-चिकित्सा को अपनाया। फिर तो रोम साम्राज्य में भारतीय जड़ी-बूटियों की भी माँग चिकित्सा के क्षेत्र में होने लगी। उसी समय वनस्पतियों और जंतुओं के बाह्य तथा आंतरिक संरचनाओं के अध्ययन भी किए गए। कृषि के क्षेत्र में मिट्टी की उवर्रता बढ़ाने के लिए फसल चक्र की पद्धति तब भी अपनाई जाती थी। भारत में वैज्ञानिक प्रगति का स्वर्ण काल ईसा से पूर्व चौथी शताब्दी से लेकर ईसा के बाद छठी या सातवीं शताब्दी तक रहा। धातु-कर्म, भौतिकी, रसायन-शास्त्र जैसे विज्ञानों का विकास भी इस युग में हुआ था। मौर्यकाल में युद्ध के लिए अस्त्रों और शस्त्रों का विकास किया गया था। कुछ यांत्रिक अस्त्रों, जैसे – प्रक्षेपकों का विकास तथा सिंचाई में अभियांत्रिकी का उपयोग उल्लेखनीय है। इस काल में भू-सर्वेक्षण की तकनीक अत्यंत विकसित थी। विशालकाय प्रस्तर स्तंभों के निर्माण में अनेक प्रकार के वैज्ञानिक कौशलों का उपयोग इस युग की एक अन्य विशेषता है।

इसके बाद गुप्तकाल में विज्ञान की सभी शाखाओं में उल्लेखनीय प्रगति हुई। बीज गणित, ज्यामिति, रसायन शास्त्र, भौतिकी, धातुशिल्प, चिकित्सा, खगोल विज्ञान का विकास चरम सीमा पर था। इस युग में अनेक ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक हुए जिनके अनुसंधानों और आविष्कारों का लोहा तत्कालीन सभ्य समाज के लोग मानते थे।

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