बाल संस्कार

मकर संक्रांति का संदेश

श्रुतम्-75

मकर संक्रांति का संदेश

संक्रांति का अर्थ है सम्यक दिशा में क्रांति अर्थात योग्य दिशा में समग्र चिंतन एवं परिवर्तन जो सामाजिक जीवन का उन्नयन करने वाला तथा मंगलकारी हो प्रचलित अर्थ वाला नहीं जहां क्रांति का अर्थ रक्त पात एवं वैमनस्य उत्पन्न कर स्वयं को स्थापित करना है।
– अपने देश में विभिन्न महापुरुषों द्वारा देशकाल परिस्थितियों एवं समाज उन्नयन की आवश्यकता के अनुसार समय – समय पर अपने क्रांतियों अर्थात सम्यक् दिशा में परिवर्तन हेतु जिसने समाज व राष्ट्र जीवन बलशाली हुआ। उदाहरण भगवान ‘ श्री राम ‘ एवं ‘ श्री कृष्ण ‘ , ‘ आचार्य चाणक्य ‘ , ‘ छत्रपति शिवाजी ‘ , ‘ गुरु गोविंद सिंह ‘ आदि महापुरुषों ने क्रांति एवं परिवर्तनों के द्वारा अत्याचार एवं अनाचार की समाप्ति कर समाज में राष्ट्र जीवन को पुष्ट एवं बलिष्ठ करते हुए श्रेष्ठ मानव मूल्यों की स्थापना की थी।
– क्रांति के चार चरण
१.शाश्वत सिद्धांतों पर आधारित एक विचार
२.विचारों की पूर्णता के लिए योजना
३.योजना की पूर्ति के लिए संगठन एवं कार्य पद्धति
४.संगठन एवं कार्य पद्धति द्वारा लक्ष्य प्राप्ति।
-आज अपने देश का विचार विश्व में चलने वाली विभिन्न गतिविधियों के संदर्भ में करें स्पष्टतः यह संक्रमण काल है। हमारे देश तथा समाज जीवन में तीव्रता एवं परिवर्तन हो रहे हैं परिवर्तन की दिशा ठीक है अथवा नहीं यह हमें विचारना है। परिवर्तन प्रगति की ओर ले जाए तो उसकी दिशा ठीक है , परंतु आगे बढ़ना ही प्रगति नहीं है।
वह सम्यक् दिशा में आगे बढ़ें तभी स्वीकार्य है। परिवर्तन की दिशा तभी ठीक होगी जब वह समाज में सुरक्षार्थ उपयोगी हो सर्वांगीण विकास के लिए सहायक हो। देश की रक्षा के लिए समर्थ हो तथा गौरव बढ़ाने का आधार हो इसलिए जन्म पर प्रसन्नता एवं मृत्यु पर शोक प्रकट करते हैं। जन्म जीवन का परिचायक है मृत्यु जीवन के अवसान का , भारत में जीवन की पूजा होती है मृत्यु की नहीं।
– परिवर्तन की दिशा शास्त्र शुद्ध , सम्यक विचार मंथन के परिणाम स्वरुप पहुंचे निष्कर्ष के अनुसार निश्चित होनी चाहिए। इस विचार मंथन का आधार अपने देश की चिंतनधारा परंपरा संस्कृति सामाजिक मानसिकता एवं मनोविज्ञान की गहरी समझ होनी चाहिए। विचार ही हर परिवर्तन का प्रेरणा स्रोत होता है सामाजिक , आर्थिक , राजनीतिक एवं धार्मिक परिवर्तन का अध्ययन यही स्पष्ट करता है।
– संसार के सभी देशों में समय-समय पर हुए परिवर्तनों का आधार कोई न कोई विचार रहा है। फ्रांस की प्रसिद्ध राज्य क्रांति का प्रेरक स्वतंत्रता बंधुत्व एवं समानता घोषवाक्य रहा। इसके पीछे का विचार लोगों का संबल बना। अमेरिका में परिवर्तन का स्वतंत्र युद्ध कहा गया है। स्वतंत्रता प्राप्त करने की इच्छा से प्रेरित हो उन्होंने अंग्रेजों से मुक्ति पाई , जनतंत्र की स्थापना की उनकी प्रेरणा का स्रोत इस संबंध में ‘ लिंकन ‘ के द्वारा प्रतिपादित जनतंत्र की विश्वविद्यालय व्याख्या जनता का जनता द्वारा तथा जनता के लिए प्रेरक रही। रूस में मार्क्स एवम लेनिन के विचार आधार बने पूंजीवादी तथा समाजवादी अवधारणाएं पाश्चात्य सभ्यता की देन है।
दोनों ही विचार धाराओं के आधार पर योग्य दिशा में परिवर्तन संबंधित देशों में नहीं हो पाया है। समाजवाद को स्वीकार कर उत्सर्ग के शिखर बैठने की कामना लेकर चलने वाला रूसी साम्राज्य इसी कारण लड़खड़ाकर ध्वस्त हो गया। वह त्रुटिपूर्ण विचार के आधार पर गलत दिशा में चलने के कारण अपने पथ से ही टूट गया। 70 वर्ष की अल्प काल में उस देश ने अपनी गलती स्वीकार कर ली पूंजीवादी विचारधारा को लेकर चलने वाले सभी देश अनेक प्रकार से संतुष्ट हैं उनकी सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था एवं संस्थाएं चरमरा रही है , निकट भविष्य में ध्वस्त होने के चिन्ह प्रकट कर रही है।
– समाजवादी एवं पूंजीवादी विचारधाराओं के आधार पर मानव को परिपूर्ण सुखी एवं विश्व को पूर्ण रुप से सभी प्रकार से सुरक्षित कराने की संभावनाए क्षीण होती जा रही है। संसार के बड़े-बड़े विचारकों की सोच इसी प्रकार की है दोनों विकल्प मानव की त्रासदी को दूर नहीं कर पा रहे हैं। भयमुक्त सुरक्षित मानव जीवन के लिए विश्व में उपयुक्त परिस्थितियां एवं वातावरण नहीं बना पा रहे हैं पश्चिमी जगत में परिवर्तन गलत दिशा में हुआ।
– भारत के पास तीसरा विकल्प है। यह परिवर्तन को सही तथा योग्य दिशा प्रदान करेगा भारतीय ऋषि मुनियों ने अपने तप और ज्ञान के आधार पर जिस भारतीय चिंतनधारा का अजस्र प्रवाहित किया है , वही विश्व के जन – जन को सुख चयन शांति प्रदान करने में समर्थ है। संपूर्ण सृष्टि को एक कुटुंब मानकर चलने के कारण भारतीय विचारधारा विश्व का कल्याण करेगी पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानव दर्शन भारतीय सोच को स्पष्ट करता है समस्त मानवता ही नहीं वरन संपूर्ण सृष्टि का कल्याण भारतीय चिंतन में है-
सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया ,
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद् दुख:भागभवेत। ‘
इस भारतीय चिंतन को प्रबल बनाने का एक मात्र यशस्वी साधन संघ कार्य है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने संपूर्ण हिंदू समाज के माध्यम से इस हिंदू राष्ट्र को परम वैभव तक पहुंचाने का उदात लक्ष्य अपने सामने रखा है। लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रत्येक व्यक्ति को जागृत, संस्कारित व संगठित कर शक्तिशाली समाज एवं राष्ट्रीय जीवन की योजना बनाई है तथा दैनिक शाखा व अन्य विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में प्रचलित ऊंच-नीच छुआछूत आदि समाज तोड़क रूढ़ियों को समाप्त कर समरसता एवं स्वाभिमान का भाव जगह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होता हुआ दिखाई दे रहा है।

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