बाल संस्कार

महान त्याग

महान त्याग

श्रुतम-136

उन दिनों सुभाष चंद्र बोस ने स्नातक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करके अपनी बौद्धिक क्षमता का परिचय दे दिया था,

किंतु उनका मन उदास और अशांत ही रहता था। वे देश समाज तथा भारतीय जनता के साथ अंग्रेजी सरकार के अमानवीय व्यवहार के प्रति चिंतित रहते थे । इसके विरुद्ध जो भी पग वे उठाते थे उनको उनके पिता श्री जानकी नाथ बोस अपनी प्रतिष्ठा के विरुद्ध मानते थे अंततः वे इन सब से सुभाष को दूर रखने के उपाय सोचने लगे। इन्हीं दिनों सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी से प्रभावित हुए। किंतु उनके पिता ने उन्हें भारत से हटाने के लिए आई.सी.एस. की परीक्षा में प्रवेश की तैयारी हेतु लंदन जाने का आदेश दिया। सुभाष यह सुनकर ठगे से रह गये।

उन्होंने एक बार प्रयास किया कि उन्हें यहीं रहकर स्नातकोत्तर अध्ययन की अनुमति मिल जाये। किंतु पिता ने इसे  सुभाष  के सामने इस रूप में रखा कि सुभाष परीक्षा से घबराता है। अतः अंत में इस कलंक को मिटाने हेतु लंदन जाने को सुभाष तैयार हुए, किंतु भारत माता के कष्ट को अपने मन में धारण कर लंदन में शीघ्र ही उनकी कुशाग्र बौद्धिक क्षमता एवं कुशल व्यवहार के कारण उनकी कई अच्छे मित्र बन गये। वहां भी उदास ही रहते थे। भारत की व्यथा उनको व्यथित किए रहती थी।समय आया, परीक्षा हुई और कुछ समय पश्चात परिणाम भी आ गया।सुभाष चंद्र बोस के मित्र उनका परिणाम लेकर अत्यंत उल्लास के साथ उनसे आकर मिले। किंतु यह क्या? उत्तीर्ण परिणाम और वह भी सर्वोत्कृष्ट परीक्षा का,फिर भी सुनकर वे तनिक भी प्रसन्न नहीं हुए। मित्रों ने उनसे पूछा,तो उन्होंने त्यागपत्र लिख दिया। त्यागपत्र का समाचार, समाचार पत्रों में अधिक गति से फैल गया कुछ अंग्रेज अधिकारी उनसे मिले और आश्चर्य के साथ पूछा-” आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?”उन्होंने उदास मन से कहा कि “मैं ब्रिटिश सरकार के अधीन  रहकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह उचित प्रकार से नहीं कर सकूंगा, यह मैं भली भांति जानता हूँ इसलिए त्यागपत्र देने का मैंने पहले ही निश्चय कर लिया था। विदेशी सरकार के अधीन रहकर मैं  मातृभूमि की सेवा कैसे कर सकता हूं ?” इस प्रकार राष्ट्र की सेवा के लिए उन्होंने सर्वोत्कृष्ट की जाने वाली सेवा के पद का परित्याग कर और अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया।

इन्ही सुभाष चंद्र बोस ने आगे चलकर आजाद हिंद फौज का गठन कर अंग्रेजी साम्राज्य की ईंट से ईंट बजा दी। *” तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा”* का नारा बुलंद किया और अपना संपूर्ण जीवन भारत माता की सेवा में अर्पित कर दिया।

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