बाल संस्कार

योग: कर्मसु कौशलम्

श्रुतम्-81

योग: कर्मसु कौशलम्

यह भारतीय प्रशासनिक सेवा अकादमी का ध्येय वाक्य है।
जो भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक संख्या 50 से लिया गया है।
बुद्धियुक्तो जहातीह
उभे सुकृतदुष्कृते |
तस्माद्योगाय युज्यस्व
योग: कर्मसु कौशलम् II
“समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है। इसलिए तू समत्वरूप योग में लग जा; यह समत्वरूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंधन से छूटने का उपाय है।”
योग से ही कर्मों में कुशलता है। अर्थात् कर्मयोग के अनुसार कर्म करने में कुशल व्यक्ति कर्मबंधनों से मुक्त हो जाता है। कर्म में कुशलता का अर्थ है, ऐसी मानसिक स्थिति में काम करना कि व्यक्ति कर्म एकदम अच्छे तरीके से करे और फल की चिंता में पड़कर खुद को व्यग्र न करे।
कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं होता, हर काम को सही ढंग से करना आपके अंदर अच्छे गुणों को विकसित करता है। जब मनुष्य के अंदर मेहनत और लगन का भाव आदत बन जाता है तब सुख और सफलता उसे स्वतः ही मिलने लगती है।

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