बाल संस्कार

 राणा ! ये रोटियां मां ने……..

*श्रुतम्-139*

 राणा ! ये रोटियां मां ने……..

दुद्धा एक भील बालक था।उसके पिता महाराणा प्रताप की सेना में एक वीर सैनिक थे और युद्ध में लड़ते -लड़ते वीरगति को प्राप्त  हुए। परिवार में केवल दुद्धा और उसकी मां दो ही शेष थे। दोनों का निर्वाह बड़ी ही कठिनाई से हो रहा था। एक बार दोनों को दो दिन तक खाने को कुछ नहीं मिला। तीसरे दिन मां ने दुद्धा के लिए मोटी -मोटी रोटियां और खांस का साग रख दिया। शत्रु की आंखें बचा कर मां आटा लाने में सफल हुई थी। दुद्दा एक दृष्टि मां पर डालता और दूसरी रोटीयों पर वह व्याकुल था, हाथ रोटियों की ओर बढ़ नहीं पा रहा था। मां ने दुद्धा से पूछा ‘बेटा क्या बात है?’ खाते क्यों नहीं? कुछ नहीं मां। इतना बोलते ही वह सुबक कर रोने लगा। मां ने गोद में लेकर पूछा- बेटा दो दिन से तुमने एक ग्रास भी नहीं लिया, रोटी क्यों नहीं खा रहे हो? अपनी मां से कुछ  छिपाओगे ?’ बालक ने कहा मेरी प्यारी मां! हम तो ,दो दिन से ही भूखे हैं। पर हमारे राणा तथा उनकी छोटे सात दिन से भूखे हैं। उनका क्या होगा ? इसी सोच के कारण कुछ खाने का जी नहीं करता।” दुध्दा की बात सुन मां की आंखों में आंसू ढुलक पड़े। दुध्दा ने मां के आंसू पोंछते हुए कहा-मां रो मत मैं अभी जाकर रोटियां देकर आता हूं ।’दुध्दा कपड़े में रोटियां छुपाकर महाराणा प्रताप के ठिकाने की ओर चल पड़ा। मां देखती रह गई।

रात के अंधेरे में दुध्दा भागता जा रहा था। शत्रु के सैनिक पहरा दे रहे थे ।अचानक उनको अंधेरे में कोई आकृति दिखाई दी। उन्होंने गोली दाग दी।

दुध्दा का हाथ लहूलुहान हो गया। निर्भीक बालक ने अपनों प्राणों की चिंता किए बिना पोटली को दूसरे हाथ में थाम लिया शत्रु की आंख से बचकर एक छोटी सी पहाड़ी पर चढ़ना आरंभ किया। राणा तक पहुंच नहीं पाया थोड़ी दूर से सीटी बजा कर वहां लुढ़क गया।

राणा ने सीटी की आवाज सुनी तो वे वहां पहुंच गए जहां दुद्दा अंतिम सांसे गिन रहा था। महाराणा के मधुर स्पर्श से उसने आंखे खोलकर मुस्कुराया और

बुदबुदाया ‘ महाराणा! ये रोटियां …..मां ने ….. वो आगे कुछ भी नहीं कह सका।

महाराणा प्रताप सब समझ गये। उनकी आंखे सजल हो गई थी। उन्होंने दुध्दा भील के रक्त को अपने माथे से लगा लिया ।

कौन जानता है कि कुंभलगढ़ की विजय का श्रेय दुध्दा भील बालक को है। वह अमर हो गया । भारत को ऐसे वीर सपूतों पर गर्व है।

 *स्वतंत्रता की बलिवेदी पर ऐसे कईं वीर बालकों  ने अपने प्राणों की आहुतियां दी है।*

 

 

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