बाल संस्कार

रामकृष्ण परमहंस

रामकृष्ण परमहंस

संपूर्ण जगत् जब शांत सोया हुआ होता है, तब रामकृष्ण परमहंस निर्जन घने वनमें वृक्षके नीचे ध्यानमग्न होकर कालीमाताकी उपासना करते थे । रामकृष्णका भतीजा हरिदाके मनमें प्रश्न उभरता था, ‘प्रति रात्रि रामकृष्णजी कहां जाते हैं ? क्या करते हैं ?’ एक रात्रि हरिदा रामकृष्णजीके पीछे-पीछे गए । रामकृष्णजी घने वनमें घुस गए । उनके हाथमें न तो दीया था, न तो मोमबत्ती । रामकृष्णजीने आंवलेके पेडके नीचे पद्मासन लगाया एवं नेत्र मूंद लिए । इससे पूर्व उन्होंने गलेमें पहना हुआ जनेऊ भी केसरी वस्त्रोंसहित उतार दिया । यह देख हरिदाको आश्चर्य हुआ । सूर्योदयतक रामकृष्णजी अविचल बैठे रहे । कुछ समय उपरांत उन्होंने यज्ञोपवित (जनेऊ) धारण किया । सूर्योपासना की । हरिदा यह सब देख रहे थे । रात्रिसे अस्वस्थ करनेवाला प्रश्न उसने किया, ‘‘आप उपासनाके समय जनेऊसहित सभी वस्त्र क्यों उतारते हैं ? यह पागलपन नहीं लगता क्या ?” उसपर रामकृष्णजी बोले, ‘‘हरिदा, ईश्वरतक पहुंचनेके मार्गमें अनेक बाधाएं आती हैं । मैं जब जगन्माताका ध्यान करता हूं, तब द्वेष, मत्सर, भय, अहंकार, लोभ, मोह, जातिका अभिमान-जैसी अनेक बातोंका त्याग करनेका प्रयास करता हूं । नहीं तो ये सभी बातें मनमें कोलाहल मचाती हैं । जनेऊ अर्थात् जातिका अभिमान, ज्ञानका अहंकार, वह भी दूर करना आवश्यक है न ! अहंकारकी बाधाएं दूर करते हुए मुझे वहां (साध्यतक) पहुंचना है ।’’

श्री रामकृष्ण परमहंस का जन्म 18 फरवरी 1836 को बंगाल प्रांत के हुगली जिले के कामारपुकुर ग्राम में हुआ था। इनके पिताजी का नाम खुदीराम चट्टोपाध्याय तथा माता का नाम चंद्रमणि देवी था। गदाधर के जन्म के पहले ही उनके माता-पिता को कुछ अलौकिक लक्षणों का अनुभव होने लगा था, जिसके अनुसार वे यह समझ गए थे कि कुछ शुभ होने वाला हैं।

इनके पिता ने सपने में भगवान विष्णु को अपने घर में जन्म लेते हुए देखा तथा माता को शिव मंदिर में ऐसा प्रतीत हुआ कि एक तीव्र प्रकाश इनके गर्भ में प्रवेश कर रहा हैं। बाल्यकाल, यानी 7 वर्ष की अल्पायु में इनके पिता का देहांत हो गया तथा परिवार के सम्मुख आर्थिक संकट प्रकट हुआ, परन्तु इन्होंने कभी हार नहीं मानी।

श्री रामकृष्ण परमहंस का जीवन साधनामय था और जन-जन को वे साधना की पगडंडी पर ले चले, प्रकाश स्तंभ की तरह उन्हें जीवन पथ का निर्देशन दिया एवं प्रेरणास्रोत बने। जिन्होंने अपने व्यक्तित्व और कर्तृत्व से न सिर्फ स्वयं को प्रतिष्ठित किया वरन् उनके अवतरण से समग्र विश्व मानवता धन्य हुई है।

भारत का जन-जन श्री रामकृष्ण परमहंस की परमहंसी साधना का साक्षी है, उनकी गहन तपस्या के परमाणुओं से अभिषिक्त है यहां की माटी और धन्य है यहां की हवाएं जो इस भक्ति और साधना के शिखरपुरुष के योग से आप्लावित है। संसार के पूर्णत्व को जो महापुरुष प्राप्त हुए हैं, उन इने-गिने व्यक्तियों में वे एक थे। उनका जीवन ज्ञानयोग, कर्मयोग एवं भक्तियोग का समन्वय था।

उन्होंने हर इंसान को भाग्य की रेखाएं स्वयं निर्मित करने की जागृत प्रेरणा दी। स्वयं की अनन्त शक्तियों पर भरोसा और आस्था जागृत की। अध्यात्म और संस्कृति के वे प्रतीकपुरुष हैं। जिन्होंने एक नया जीवन-दर्शन दिया, जीने की कला सिखलाई।

गदाधर चट्टोपाध्याय उनके बचपन का नाम था। इन्होंने सभी धर्मों और जातियों की एकता तथा समानता हेतु जीवनभर कार्य किया, परिणामस्वरूप इन्हें राम-कृष्ण नाम सर्व साधारण द्वारा दिया गया एवं इनके उदार विचार एवं व्यापक सोच जो सभी के प्रति समभाव रखते थे, के कारण परमहंस की उपाधि प्राप्त हुई। बचपन से ही इनकी ईश्वर पर अडिग आस्था थी, ईश्वर के अस्तित्व को समस्त तत्वों में मानते थे तथा ईश्वर के प्राप्ति हेतु इन्होंने कठोर साधना भी की, ईश्वर प्राप्ति को ही सबसे बड़ा धन मानते थे।

श्री रामकृष्ण परमहंस को दृढ़ विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं और यही वजह है कि उन्होंने ईश्वर की प्राप्ति के लिए भक्ति का मार्ग अपनाया और कठोर साधना की। वह मानवता के पुजारी थे और उनका दृष्टान्त था कि ईश्वर तक पहुंचने के रास्ते अलग-अलग हैं, लेकिन परमपिता परमेश्वर एक ही है। उन्होंने सभी धर्मों को एक माना तथा ईश्वर प्राप्ति हेतु केवल अलग-अलग मार्ग सिद्ध किया। वे माँ काली के परम भक्त थे, अपने दो गुरुओं योगेश्वरी भैरवी तथा तोतापुरी के सान्निध्य में इन्होंने सिद्धि प्राप्त की, ईश्वर के साक्षात् दर्शन हेतु कठिन तप किया एवं सफल हुए। इन्होंने मुस्लिम तथा ईसाई धर्म की भी साधनाएँ की और सभी में एक ही ईश्वर को देखा। वे भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूतों में प्रमुख हैं।

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