बाल संस्कार

राव खलकसिंह दौआ

स्वाधीनता का अमृत महोत्सव

मध्यभारत के गुमनाम नायक (Unsung Heroes) ……

राव खलकसिंह दौआ

भारतीय स्वाधीनता महासमर के विलक्षण यौद्धा थे- राव खलकसिंह दौआ । सेवढ़ा के मानस पटल पर आज भी स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हैं राव खलकसिंह दौआ की वीरता के पद चिह्न । सेवढ़ा अंचल की लोक गाथाओं के महानायक हैं -राव खलकसिंह दौआ ।

दतिया रियासत में सेेवढ़ा कस्बा सिंध नदी के तट पर बसा। 1857 के क्रान्तियों के समय तो अनेक क्रान्तिकारी यहीं से अपने अभियान का संचालन भी करते। सिंध और पहूज नदियों के अलावा सेंवढ़ा का सुदृढ़ किला भी उनके लिए अच्छा पनाह स्थल था। उस समय सेंवढ़ा के किले के किलेदार राव खलकंिसह दौआ थे। वह 1857 सें किलेदारी संभाले हुए थे। राव दौआ खलकसिंह अधिकार सम्पन्न किलेदार थे, जो उसके द्वारा प्रदत्त सनद से मालूम होता है, जिसके द्वारा उसने बाबा बिहारी सरन के मंदिर को मौजा सिंहगवा (परगना सेंवढ़ा ) में काफी में भूमि लगाई थी। खलकसिंह दौआ ने, साहस, शक्ति और योग्यता के बल पर सेंवढ़ा तथा सेंवढ़ा परगना के गाँवों पर, विशेषकर अपनी बिरादरी वालों पर, अपना अच्छा प्रभाव जमा लिया था। 1848 में खलकसिंह दौआ ने अपनी गतिविधियाँ इतनी तेज कर लीं कि एजेन्ट हेमिल्टन ने दतिया दरबार से अनुरोध किया कि ‘खलकसिंह दौआ को किलेदार के पद से हटा दिया जाए तथा उसके सभी अधिकार आदि समाप्त किये जायें। उसने तो सेंवढ़ा परगना के सभी अहीरों पर अपना प्रभाव जमा लिया है। यह जाति हमें बड़ी दुखदायी महसूस हो रही है।’

उन दिनों दतिया का राजा विजयबहादुर निः संतान था इसलिए उसने भवानीसिंह को गोद लिया था। 1857 में उसकी मृत्यु के बाद रानी के विश्वस्त सरदार गद्दी पर अर्जुनसिंह को बैठाना चाहते थे जबकि ब्रिटिश सरकार ने भवानी सिंह को ही मान्यता प्रदान की तथा शासन चलाने के लिए रानी को रीजेन्ट बनाया। राजगद्दी के दावेदारों में झगड़ा होते देखकर ब्रिटिश सरकार ने अर्जुन सिंह को दतिया से निष्कासित कर दिया और उसे नृपतिसिंह की अभिरक्षा में रख दिया। इस पर नृपतसिंह अर्जुन सिंह को लेकर सेंवढ़ा चला गया ।कुछ समय बाद ब्रिटिश सरकार ने दतिया की रानी से रीजेन्ट का काम भी छीन लिया और राज्य के शासन प्रबंध के लिए ब्रिटिश सरकार ने कैप्टन थाॅमसन को दतिया राज्य का राजनीतिक सुपरिन्टेन्डेन्ट बना दिया। इस नियुक्ति से तथा रीजेन्सी का काम छुड़ाने से दतिया की रानी ब्रिटिश सरकार से रुष्ट हो गयी।

दतिया राज्य के शासन प्रबंधक (राजनीतिक सुपरिन्टेन्डेन्ट) की नियुक्ति से खलक सिंह दौआ भी संतुष्ट नहीं थे। अतः खलकसिंह दौआ ब्रिटिश सरकार के विरोध में मैदान में आ गये। पड़ोसी इलाके के बरजोर सिंह तथा दौलत सिंह तो पहले से ही ब्रिटिश सरकार के विरोधी थे ही। खलकसिंह ने इनसे सम्पर्क स्थापित किया और वह क्रांतिकारी गतिविधियों में शाामिल हो गये। कछवाहागढ़, सेंवढ़ा से लगा हुआ परगना था। कछवाहागढ़ के दो प्रमुख क्रांतिकारी दौलत सिंह निवासी दबोह तथा बिलावा निवासी बरजोर सिंह, जालौन तथा दतिया राज्य में क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन कर रहे थे। तभी से खलक सिंह इनके प्रभाव से, दतिया रियासत एवं ब्रिटिश सरकार के विरोध में स्वर में स्वर मिलाने लगे। वह दौलत सिंह तथा बरजोर सिंह को आपूर्ति, संघर्ष आदि में मदद भी करते थे और इसी प्रकार उन्हें भी नदीगाँव के भूस्वामियों से भी मदद मिलती थी। दौलत सिंह तथा बरजोर सिंह मिलकर अपना अभियान यहीं से चलाते थे, लेकिन उनके अपने-अपने पृथक दल थे जो अक्सर बीस से तीस मील पर विचरण किया करते थे और सरकारी फोर्स से मुठभेड़ का मौका आता तो दोनों दल एक हो जाते।

महारानी लक्ष्मीबाई को सेंवढ़ा के किलेदार राव खलक सिंह दौआ पर भरोसा था तभी तो महारानी, कालपी युद्ध में पराजित होने पर भी कालपी से ग्वालियर के लिए पलायन करते समय मार्ग में, सेंवढ़ा ठहरी थी ओर रात भर यहाँ के बाबा बिहारीसरन के मंदिर की दालान में विश्राम किया था। महारानी अगले दिन प्रातःकाल प्रस्थान करने लगी तो पुजारी ने महारानी को नदी पार कराया। महारानी ने पुजारी को भेंट स्वरूप पाँच सौ रूपये की सनद प्रदान की।

जब ब्रिटिश सरकार ने क्रांति का आकलन किया तो देखा कि 19 फरवरी 1862 तक स्थिति पुर्ववत थी। लेकिन जल्दी ही उपद्रव तेज होने लगे। इस बाबत् पड़ोसी नगरी आलमपुर का महाविसदार, गोपालपुरा से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर, बताता है कि सेंवढ़ा की रियाया तोपें ढालने तथा अस्त्र शस्त्रों की तैयारी में जुट गई है और सेंवढ़ा किला के भण्डारों में संग्रहीत अनाज को रियाया के लिये खोल दिया गया है।

इस बात की खबर जब दौलतंिसंह और बरजोरसिंह को लगी तो उन्होंने, कछवाहागढ से दो सौ सैनिक से लेकर पाॅच सौ सशस्त्र क्रान्तिकारी सेंवढ़ा, भेज दिये और स्वयं अपने साथियों सहित सेंवढ़ा के निकट बीहड़ों में छुपे रहे। जब ये क्रान्तिकारी कछवाहागढ़ से आ गये, तब धौलपुर के ठाकुर के अधीन चालीस पचास बन्दूकधारी क्रान्तिकारी भी सेंवढ़ा आ धमके। उस समय सेंवढ़ा में क्रान्तिकारियों का जमावड़ा देखते ही बनता था। सेंवढ़ा के राजनीतिक सुपरिन्टेन्डेन्ट कैप्टन थाॅमसन ने दौआ से सेंवढ़ा की किलेदारी छीन ली और उसके भाई जोगराज को स्थानापन्न किलेदार बना दिया। अब तो खलकसिंह दौआ खुलेआम ब्रिटिश सरकार का विरोधी हो गए। खलकसिंह, दतिया की रानी के मित्र धर्मजीत, केसला (ग्वालियर, राज्यान्तर्गत परगना केसला) के धीरजसिंह को दतिया रियासत से अक्टूबर 1861 में निष्कासित कर दिया गया।

दतिया की रानी के काका धीरजसिंह को भी राज्य बदर कर दिया गया और उसे भी सिन्धिया के अधिकारियों ने झांसी में गिरफ्तार कर लिया तथा उसे कड़े नियंत्रण में रखा। दतिया राज्य के पूर्व दीवान धर्मजीत को भी ऐसी ही हरकतों के कारण दीवान पद से हटा दिया गया और वह दतिया राज्य छोड़कर पलायन कर गया, लेकिन उसे मऊरानीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया। अन्त में खलकसिंह दौआ पकड़ा गया। उस समय खलकंिसंह की आयु 62 वर्ष की थी। ब्रिटिश सरकार ने उसे आजीवन कारावास की सजा भुगतने हेतु चुनार के किले में बंद कर दिया। धीरजसिंह पर भी मुकदमा चला और आजीवन कारावास की सजा भुगतने हेतु उसे भी चुनार भेज दिया गया। वहीं पर हैजे की बीमारी से धीरजसिंह का 18 जुलाई 1869 को निधन हो गया। उपरोक्त सभी बंदी गंभीर रूप से बीमार थे, जिसका कारण था – लम्बा एकान्तवास, मानसिक परेशानियाँ, निज परिवारों के साथ पत्र सम्पर्क का अभाव तथा अत्यन्त विलम्ब। दतिया राज्य के ही निम्नलिखित क्रांतिकारियों को भी आजन्म कारावास की सजा देकर दिसम्बर 1862 में चुनार भेज दिया गया- कुँअर नृपतिसिंह आयु 58 वर्ष, ठाकुर महादेवसिंह आयु 55 वर्ष, और जुझारसिंह आयु 51 वर्ष। चुनार के किले में कैद राव खलकसिंह दौआ की मृत्यु कब हुई इसकी जानकारी नहीं मिलती।

 

 

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