बाल संस्कार

*राष्ट्र एक भाव है, एक चेतना है, जिसका सबसे छोटा घटक व्यक्ति है और व्यक्ति को सुसंस्कृत तथा राष्ट्रीय जीवन से जुड़ा होना चाहिए*

*श्रुतम्-162*

*राष्ट्र एक भाव है, एक चेतना है, जिसका सबसे छोटा घटक व्यक्ति है और व्यक्ति को सुसंस्कृत तथा राष्ट्रीय जीवन से जुड़ा होना चाहिए*

*-बाबा साहेब भीमराव रामो जी अम्बेडकर*

अम्बेडकर का मत था कि राष्ट्र व्यक्तियों से होता है, व्यक्ति के सुख और समृद्धि से राष्ट्र सुखी और समृद्ध बनता है। डा़ अम्बेडकर के विचार से राष्ट्र एक भाव है, एक चेतना है, जिसका सबसे छोटा घटक व्यक्ति है और व्यक्ति को सुसंस्कृत तथा राष्ट्रीय जीवन से जुड़ा होना चाहिए। राष्ट्र को सर्वोपरि मानते हुए अम्बेडकर व्यक्ति को प्रगति का केन्द्र बनाना चाहते थे। वह व्यक्ति को साध्य और राज्य को साधन मानते थे।डा़ अम्बेडकर ने इस देश की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति का सही और साफ आकलन किया। उन्होंने कहा कि भारत में किसी भी आर्थिक-राजनीतिक क्रांति से पहले एक सामाजिक -सांस्कृतिक क्रांति की दरकार है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भी अपनी विचारधारा में अंत्योदय की बात कही है। अंत्योदय यानी समाज की अंतिम सीढ़ी पर जो खड़ा हुआ है, सबसे पहले उसका उदय होना चाहिए। राष्ट्र को सशक्त और स्वावलंबी बनाने के लिए समाज की अंतिम सीढ़ी पर जो लोग है उनका सोशियो इकोनॉमिक डेवलपमेंट करना होगा। किसी भी राष्ट्र का विकास तभी अर्थपूर्ण हो सकता है जब भौतिक प्रगति के साथ साथ आध्यात्मिक मूल्यों का भी संगम हो। जहां तक भारत की विशेषता, भारत की संस्कृति का सवाल है तो यह विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति है। भारतीय संस्कृति को समृद्ध और श्रेष्ठ बनाने में सबसे बड़ा योगदान वंचित समाज के लोगों का है। इस देश में आदि कवि कहलाने का सम्मान केवल महर्षि वाल्मीकि को है, शास्त्रों के ज्ञाता का सम्मान वेदव्यास को है।

भारतीय संविधान के निर्माण का श्रेय अम्बेडकर को जाता है। वर्तमान में कुछ देशी-विदेशी शक्तियां हमारी इन सामाजिक – सांस्कृतिक धरोहरों को हिंदुत्व से अलग करने की योजनाएं बना रही हैं। अब कुछ लोगों द्वारा यह सिद्व करने का प्रयास किया जा रहा है कि डा़ अम्बेडकर ने मार्क्स के विचारों का विस्तार किया है। उन्होंने समाज परिवर्तन की मार्क्सस्टि प्रणाली में कुछ नई बाते जोड़ी हैं। लेकिन ऐसा नहीं है, वे भूल जाते हैं कि मार्क्स का दर्शन केवल दो तीन सौ साल पहले का है। मार्क्स की पूंजीवादी व्यवस्था में जहां मुट्ठीभर धनपति शोषक की भूमिका में उभरते हैं वहीं जाति और नस्लभेद व्यवस्था में एक पूरा का पूरा समाज शोषक तो दूसरा शोषित के रूप में नजर आता है, जिसका समाधान अम्बेडकर सशक्त हिंदू समाज में बताते हैं, क्योंकि वह जानते थे कि हिंदू धर्म न तो इसे मानने वालों के लिए अफीम है और न ही यह किसी को अपनी जकड़न में लेता है। वस्तुत: यह मानव को पूर्ण स्वतंत्रता देने वाला है। यह चिरस्थायी विकास, संपन्नता तथा व्यक्ति व समाज को संपूर्णता प्रदान करने का एक साधन है। शायद मार्क्सवादियों को एक भारतीय नायक की जरूरत है और अम्बेडकर से अच्छा नायक उन्हे कहां मिलेगा, इसलिए वह उनका का पेटेंट करवाने में जुट गए हैं।

 

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