बाल संस्कार

रोचक कहानी

रोचक कहानी
स्कूल खुल गए हैं, मैं अपने बेटे को पहले दिन स्कूल छोड़ने गया| अभी उसकी उम्र ही क्या है महज तीन साल, वह दादा-दादी से सुन-सुनकर स्कूल को अपनी कल्पना में बुन चुका था वह सोचता होगा कि स्कूल में उसके नऐ दोस्त बनेंगे जो उसके साथ खेलेंगे, झूला झूलेंगे ऊधम करेंगे खूब मजा़ आऐगा| उसकी यह कल्पनाऐं सच से सामना करने जा रही थीं| वह सुबह से ही तैयार होने मचल रहा था मां से जिद करके वह तैयार हुआ यूनीफॉर्म पहनी, स्कूल बेग कधों पर लटकाया और स्कूल के टाईम से पहले ही चलने की जिद करने लगा| स्कूल का टाईम होते ही मैं उसे लेकर स्कूल पंहुचा, वह बड़ा खुश हुआ| वह मेरे साथ खुद चलकर क्लास में गया तब तक कई बच्चे आ चुके थे अधिकांश रो रहे थे| मेरा बेटा उन्हे देखकर बोला पापा ये सब बच्चे रो क्यों रहे हैं, मैंने कहा बेटा ये पहली बार मम्मी-पापा से अलग होकर स्कूल आए हैं ना इसलिए रो रहे हैं| इतने में टीचर ने बेटे को क्लास में ले लिया वह कुछ समझ पाता तब तक गेट भी बंद कर दिया मुझे बेटे के रोने की आवाज आई, अपनी क्लास के सभी रोते बच्चों को देखकर वह भी रोने लगा था| नर्सरी की सभी क्लासेस से बच्चों के रोने की आवाजें आ रही थीं|
मेरे मन में बेटे का सवाल फिर आया कि ‘पापा ये सब बच्चे रो क्यों रहे हैं’ पर इस बार मैंने खुद को जो उत्तर दिया वह अलग था कि ‘आज से इन मासूमों का बचपन छिन रहा है ये इन्हे मालूम नहीं फिर भी रो रहे हैं’|
बड़ा भावनात्मक क्षण था वह, सवा घण्टे बाद जब छुट्टी हुई तो मेरा बेटा आते ही बोला, पापा ऐसा होता है स्कूल ? मैने कहा हां वह मुझे देख रहा था उसकी आंखे रोने से लाल हो गई थीं चेहरा उतरा हुआ था अब वह शांत था |
ग्लोबलाइजेशन के इस युग में कैरीयर को लेकर पेरेंट्स में इतनी अधिक चिंता है कि भाव पक्ष समाप्त सा हो गया है| कैसे भी अच्छे स्कूल कॉलेज में दाखिला दिलाकर बच्चे को ATM. बनाने की सोच हावी हो रही है ऐसे मे बच्चों का स्वाभाविक विकास उसकी रुचि, प्रकृति और क्षमताओं के अनुरूप नहीं हो पा रहा| मैकाले की शिक्षा पद्धति से पढ़े पेरेंट्स भी बच्चों को नौकरशाह बनाने पर आमादा हैं कर्जा लेकर इंजीनियर-डॉक्टर बनाने की स्पर्धा चल रही है| मध्यम वर्ग में ये चलन ज्यादा है, बच्चे इस आपा-धापी में माता पिता के पास होकर भी दूर हो रहे हैं|
अच्छी किताबी शिक्षा अत्यंत् अनिवार्य है, उससे अधिक अनिवार्य है अच्छे संस्कारों की शिक्षा जिसके गुरू हैं माता पिता और संस्थान है बच्चे का अपना घर| वह क्या बनेगा यह भविष्य में तय होगा पर बुनियाद अच्छी है तो वह अच्छा ही बनेगा बस उस पर अपने सपने थोपने के बजाए उसकी छिपी प्रतिभा समझकर उसके विकास के उपाय किए जांए| वर्ना हमारे आस- पास ऐसे कई उदाहरण मिल जाऐंगे कि बच्चों को कुछ बनाने के लिए उन्होंने कितना कुछ किया पर वो बन कुछ और गए|

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