बाल संस्कार

लेह-लद्दाख में  भी अपना  दुःख भूलकर लोगों की सेवा में लगे रहे स्वयंसेवक

*श्रुतम्-217*

 *लेह-लद्दाख में  भी अपना  दुःख भूलकर लोगों की सेवा में लगे रहे स्वयंसेवक*

 

भारतवर्ष के सुदूर उत्तर में हिमालय श्रृंखला के पार सदैव हिम आच्छादित पर्वतों से घिरी हुई चोटियों के मध्य बसा लेह लद्दाख वास्तव में देवभूमि है। इसे भारत की छत, चन्द्रस्थल तथा लामाओं की धरती भी कहते हैं। यहां लगभग 12 महीने ही ठंड पड़ती है। इसकी 42000 वर्ग किमी जमीन चीन के कब्जे में है जब कि 5.5  हजार वर्ग किमी जमीन पाकिस्तान द्वारा चीन को भेंट की गई है।

5 घाटियों में बसा लद्दाख सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है। इनमें प्रमुख है लेह, चांगघांग, नुब्रा, शुरू व जंस्कार घाटी। लेह लद्दाख की अधिकतर सीमाएं चीन अधिकृत तिब्बत से मिलती है। भारतीय राज्यों में हिमाचल की सीमाएं लद्दाख से मिलती है। पहले लद्दाख से तिब्बत, चीन, अफगानिस्तान आदि देशों से व्यापार भी होता था। नुब्रा घाटी में सिल्करोड आज भी विद्यमान है। लद्दाख में मुख्य रूप से बौद्ध और मुस्लिम आबादी ही है। दोनों की जनसंख्या लगभग बराबर है। लेह जिला बौद्ध बहुल तो कारगिल जिला मुस्लिम बहुल है। यहां की भाषा मुख्यतः  भोटी व बल्टी है। यहां एक आर्यन घाटी भी है जहां के निवासी खुद को मूलनिवासी भी कहते हैं। यह लगभग 10-12 गांव में बसते हैं।

 

सामरिक दृष्टि से भी लद्दाख का बड़ा महत्व है। एक तरफ चीन की गिद्ध दृष्टि तो दूसरी तरफ धूर्त पाकिस्तान है। ऐसी स्थिति में यहां के देशभक्त लोग सदैव एक प्रहरी के रूप में सेना के साथ सहयोग करते हैं। धार्मिक दृष्टि से लद्दाख में बड़े-बड़े बौद्ध मठ व स्तूप है जहां भगवान बुद्ध व बौद्धों के गुरु की पूजा होती है।  ऐसे दुर्गम में कठिन स्थान पर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपना परचम लहराया है। संघ का शुरुआती दौर तो संपर्क से ही चला। सर्वप्रथम कश्मीर के स्वयंसेवक अमरनाथ वैष्णवी 1968 में लेह आए। उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से लेह में कुछ समय संघ की शाखा चलाई और बौद्ध समाज के जागरण में अहम भूमिका निभाई।

 

प्रारंभ में संघ कार्य बड़ी कठिनाई से बढ़ा लेकिन अब संघ को सब ने स्वीकार कर लिया है। सन 2000, 2006, 2008 एवं 2010 में आई भीषण त्रासदी में संघ कार्यकर्ताओं ने महत्वपूर्ण कार्य किए। दिनांक 5 अगस्त 2010 की आधी रात को जब क्षेत्र में प्राथमिक वर्ग चल रहा था तभी बादल फटने की त्रासदी ने सब को झकझोर कर रख दिया। सैकड़ों लोग बेघर हो गए वह मारे गए। इस विकट परिस्थिति में लद्दाख कल्याण संघ व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बैनर तले कार्यकर्ताओं ने मोर्चा संभाला। रात में ही 27 जानें बचाई गई तथा 35 शवों को बाहर निकाला गया। लंगर व सेना के अस्पताल में संघ कार्यकर्ता लोगों की सेवा में जुट गए। जम्मू से 23 ट्रक राहत सामग्री का वितरण लद्दाख के 61 गांवों में हुआ।

*संघ के कई कार्यकर्ताओं के रिश्तेदार इस भीषण त्रासदी का शिकार हुए किंतु वे अपना दुख भूलकर लोगों की सेवा में डटे रहे। यही संघ का सेवा संस्कार है। यही स्वयंसेवक का स्वभाव है।*

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