बाल संस्कार

वयं पंचाधिक शतम्

श्रुतम्-60

वयं पंचाधिक शतम्

हमारे बीच भले ही कितने मतभेद हों; पर यदि कोई बाहरी संकट आये, तो सबको एकजुट होकर उसका मुकाबला करना चाहिए। इस संबंघ में महाभारत का एक प्रसंग श्री गुरुजी सुनाते थे।
जुए में हारने के बाद पांडव अपने बारह वर्ष के वनवास-काल में एक बार द्वैतवन में ठहरे हुए थे। जब दुर्योधन को यह पता लगा, तो उसने उन्हें अपमानित करने के लिए अपने भाइयों के साथ वहाँ जाने का निश्चय किया। उसके आदेश पर सब अच्छे वस्त्र व आभूषण पहनकर अपने वैभव का प्रदर्शन करते हुए चल दिये।
चलते-चलते वे द्वैतवन के सरोवर के पास पहुँचे। वहाँ गंधर्वराज चित्रसेन अपने परिवार सहित ठहरा हुआ था। दुर्योधन के कर्मचारी जब वहाँ डेरे-तम्बू लगाने लगे, तो चित्रसेन ने उन्हें मना किया; पर वे नहीं माने। इस पर उसने दुर्योधन के कर्मचारियों को भगा दिया। यह पता लगने पर दुर्योधन ने युद्ध छेड़ दिया; पर चित्रसेन ने उन्हें पराजित कर बंदी बना लिया।
कुछ सैनिक रोते-चिल्लाते पांडवों के पास जा पहुँचे। दुर्योधन की पराजय सुनकर भीम को बहुत खुशी हुई। वह बोला – बहुत अच्छा हुआ। हमें परेशान करने का उसे अच्छा दंड मिला। अब उसे चित्रसेन की कैद में ही पड़ा रहने दो।
लेकिन युधिष्ठिर ने कहा – दुर्योधन चाहे जैसा भी हो; पर है तो हमारा भाई ही। आपसी संघर्ष में हम सौ और पाँच हैं; पर यदि किसी तीसरे से युद्ध होता है, तो हम एक सौ पाँच हैं (वयं पंचाधिक शतम्)। यह कहकर उन्होंने अर्जुन को भेजकर सबको छुड़वाया।

संघ की मान्यता है कि देश के बारे में हमें सदा धर्मराज युधिष्ठिर के वाक्य को ही आधार बनाकर कार्य करना चाहिए।

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