बाल संस्कार

वीरांगना के रूप में नारी का योगदान

श्रुतम्-131

वीरांगना के रूप में नारी का योगदान

भारत में अपनी युद्ध कला के लिए विख्यात अनेक नारियां हुईं हैं जो भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म को बचाने के लिए खुद ही समरभूमि में कूद पड़ीं। अपने राज्य के बाहर एवं अंदर भारतवर्ष के प्रसिद्ध तीर्थ और स्थानों में कुँआ व मंदिरों की निर्माण कराने वाली और शास्त्रों के मनन चिंतन और प्रवचन हेतु मन्दिरों में विद्वानों की नियुक्ति करने वाली मालवा साम्राज्य इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर का भारतीय संस्कृति के उत्थान में अतुलनीय योगदान है।
मराठा शासित झांसी राज्य की रानी और 1857 की क्रांति की दूसरी शहीद वीरांगना लक्ष्मीबाई का योगदान भी महान है जिन्होंने अपने राज्य और प्रजा की रक्षा में मात्र 29 साल की उम्र में अंग्रेज साम्राज्य की सेना के सामने युद्ध करके वीरगति को प्राप्त होकर, नारियों को बता दिया कि भारतीय संस्कृति और संस्कारों से पली-बढ़ी नारी युद्ध कला में भी पीछे नहीं है।
ऐसे ही महोबा के चंदेल राजा सालवाहन की पुत्री और गोंड राजा दलपत शाह की पत्नी रानी दुर्गावती ने अपने पति की असमय मृत्यु के बाद राज-काज संभाला और मुगल शासक आसिफ खान से युद्ध करके अपनी वीरता से नारीशक्ति को सिद्ध किया।


1857 के स्वतंत्रता संग्राम से भी 33 वर्ष पहले अंग्रेजों से सशस्त्र मुकाबला करने वाली कर्नाटक के कित्तूर की रानी चेन्नम्मा के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के लिये सशस्त्र संघर्ष करने वाले सबसे पहले शासकों में रानी चेनम्मा को जाना जाता है। अपने महान युद्धकौशल के लिए विख्यात रानी चेनम्मा दक्षिण भारत की लक्ष्मीबाई कहलाती हैं। इन वीर वीरांगनाओं ने अपने युद्ध कौशल से रणभूमि में जाकर यह सिद्ध किया कि भारत के संस्कारों से सुसज्जित नारी एक ओर प्रेम और समर्पण की जीवंत मूर्ति है तो राष्ट्र और संस्कृति के दुश्मनों के लिए वही नारी साक्षात यमराज का रूप है।

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