बाल संस्कार

वीर बालक प्रल्हाद

वीर बालक प्रल्हाद

Prahlad-Narsingh and Hiranyakashipu story 1 in hindi – Hindi-Web

 यह कथा श्री वसिष्ठजी द्वारा श्रीरामजीको योग वसिष्ठमें विद्यमान उपशम प्रकरणमें कथन की गई है । इससे यह स्पष्ट होता है कि उपासना के योगसे ईश्वर की कृपा प्राप्त कर ज्ञान संपन्नता आती है और आत्मज्ञान प्राप्त होने हेतु स्वयं के प्रयासों एवं विचारों की आवश्यकता है । यह कथा इस प्रकार है – पातालका राजा हिरण्यकश्यप अतिशय घमंडी था । श्रीविष्णुजी ने नृसिंहावतार लेकर उसका वध किया । अन्य असुर भयभीत हुए । भगवान विष्णु के वापस जाने के उपरांत प्रल्हाद ने असुरों को धीर देकर उन्हें उपदेश दिया । तदनंतर उसने विचार किया कि, ‘देवता अतुल पराक्रमी हैं । उन्होंने मेरे पिता एवं बलाढ्य असुरोंको नष्ट किया । उनपर आक्रमणकर नष्ट हुआ वैभव प्राप्त करना असंभव है, इसलिए उन्हें अब भक्तिसे वश करना होगा ।’ ‘नमो नारायणाय’ यह नाम जप कर उसने तप करना प्रांरभ किया । यह देखकर सर्व देवता आश्चर्यचकित हुए । ‘इसके पीछे असुरोंका कुछ गुप्त कपट होगा’, ऐसी शंका उन्होंने श्रीविष्णुजी से व्यक्त की । श्रीविष्णुजी ने उन्हें समझाया, ‘बलवान असुर मेरी भक्ति कर अधिक बलवान होते हैं, यह सत्य है; किंतु प्रल्हाद की भक्ति से डरनेकी आवश्यकता नहीं, उसका यह अंतिम जन्म होगा, क्यों की वह मोक्षार्थी है ।’

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भक्ति के कारण प्रल्हाद के मन में विवेक, वैराग्य, आनंद जैसे गुण विकसित हुए । भोग के प्रति आसक्ति नष्ट हुई । भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर ‘तू परमपद तक पहुंचेगा’ ऐसा वरदान दिया । ईश्वरके दर्शन से प्रल्हाद का अहंकार नष्ट हुआ । वह शांत, सुखी, समाधिस्थित हुआ । ऐसी परिस्थिति में अधिक समय बीत गया । उस समय असुरों ने उसे जागृत करने का प्रयास किया । असुरों का कोई भी शासनकर्ता नहीं रहा । देवताओं को असुरों का भय नहीं रहा । शेषशय्यापर निद्रिस्त श्रीविष्णु जगे और उन्होंने मन में तीनों लोकों की स्थिती का अवलोकन किया, ‘दैत्योंका सामर्थ्य अल्प हुआ है और देवता शांत हुए हैं । उन्होंने असुर एवं मानव का द्वेष करना छोड दिया है । ऐसी स्थिती में पृथ्वी पर होने वाले यज्ञयागादि क्रिया बंद होगी । भूलोक नष्ट होगा । ये त्रिभुवन कल्पांततक है, परंतु इस संकल्पको बाधा आएगी । इसी कारण प्रल्हादको सावधान करना होगा ।’ इसके उपरांत श्रीहरी पातालमें जा पहुंचे । उन्होंने प्रल्हादको उसका राज्य एवं शरीरका स्मरण दिया । श्रीविष्णुजीके आज्ञाके अनुसार प्रल्हादका राज्याभिषेक हुआ । भय, क्रोध, कर्म फल से विमुक्त होकर उसने राज्य किया और अंत में परमपद तक पहुंचा । इसी प्रकार उन्होंने स्व प्रयत्नसे सर्व प्राप्त कर लिया ।

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