बाल संस्कार

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप:-प्रारंभिक जीवन

*श्रुतम्-221*

*वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप:-प्रारंभिक जीवन*

 

पन्नाधाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदय सिंह की रक्षा की। उदय सिंह महाराणा सांगा के सबसे छोटे पुत्र थे। कुंभलगढ़ में उनका विवाह पाली के *अखैराज सोनगरा की पुत्री जयवंती देवी* के साथ हुआ। इन्हीं की पावन कोख से 9 मई 1540 *ज्येष्ठ  शुक्ला तृतीया विक्रम संवत 1597* को *कुंभलगढ़ में महाराणा प्रताप का जन्म* हुआ। संयोग से इसी समय उदयसिंह ने बनवीर को हराकर चित्तौड़ प्राप्त किया। वे मेवाड़ के नए महाराणा बने ।

 

प्रताप अपनी मां जयवंती देवी के पास कुंभलगढ़ में रहकर शिक्षा दीक्षा प्राप्त करने लगा। मां ने उसे बचपन में ही स्वतंत्रता की घुट्टी पिला दी थी। निहत्थे शत्रु पर वार न करने की सलाह देकर, दो तलवारे रखने का आग्रह किया। मां की शिक्षा से प्रताप निरंतर *शस्त्र और शास्त्र का ज्ञान* प्राप्त कर रहे थे।

 

कुंभलगढ़ में ही प्रताप *भील जाति के बालकों के साथ* खेलने लगे थे। वे उनमें *कीका* नाम से लोकप्रिय हो गए। जनजाति बालों का यह संबंध भविष्य में भीलों के स्वतंत्र युद्ध में शामिल होने का आधार बना।

 

सन् 1552 ई. में प्रताप माँ  के साथ चित्तौड़ आ गए। चित्तौड़ के झाली महल में रहने लगे। *कृष्ण दास रावत* की देखरेख में उनकी शास्त्र शिक्षा प्रारंभ हो गई। वे शीघ्र ही तलवार, भाला तथा घुड़सवारी कला में पारंगत हो गए।

 

इसी समय मेड़ता से चित्तौड़ आए *जयमल राठौड़* से प्रताप ने युद्ध संबंधी विशेष ज्ञान प्राप्त किया । व्यूह बनाकर, शत्रु दल को परास्त करने की अनेक विधियां सीखी तथा खासतौर पर *छापामार युद्ध कला* में प्रताप ने निपुणता प्राप्ति की।

 

17 वर्ष की अल्पायु में प्रताप सैनिक अभियानों पर जाने लगे। वागड़ के सांवल दास व उनके भाई करमसी चौहान को सोम नदी के किनारे युद्ध में परास्त किया। छप्पन क्षेत्र के राठौड़ों वह गोडवाड़ क्षेत्र को भी परास्त कर अपने अधीन किया। उनकी वीरता की सर्वत्र प्रशंसा होने लगी।

 

इसी समय *महाराणा प्रताप का विवाह राव मामरख पँवार की पुत्री अजबांदे कंवर* के साथ हुआ। प्रताप ने इस समय देश की राजनीतिक स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करना प्रारंभ कर दिया। भविष्य को ध्यान में रखकर मित्रों का चयन कर उन्हें प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया।

16 मार्च 1539 में प्रताप को महारानी अजबांदे की कोख से *अमर सिंह* नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। प्रताप के 16 विवाह हुए। जिनसे उन्हें 17 पुत्र व पांच पुत्रियां प्राप्त हुई। प्रताप के 24 भाई व 20 बहिनें थी। महाराणा सांगा व कर्मवती प्रताप के दादा दादी थे।

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