बाल संस्कार

शराब

शराब
एक बोधकथा है। किसी देश का राजा बहुत अच्छा था। प्रजा उससे बहुत प्रसन्न रहती थी। लेकिन राजा को पीने की लत लग गई। वह शराब में बेसुध रहने लगा। इसके चलते राज-काज की व्यवस्था बिगड़ने लगी। बात धीरे-धीरे फैलने लगी। प्रजा भयभीत थी, अगर पड़ोसी राजा को भनक लगी तो वह हमला कर हमें लूट लेगा।

संयोग से एक साधु बाबा झूमते- झामते उस राज्य में आ गए। वहीं कहीं अपना डेरा डाल दिया। एक दिन राज्य के कुछ बडे़-बूढे़ उनके पास गए और उन्हें अपनी समस्या बताई। साधु ने सारी बात सुनकर कहा कि अगर आप राजा को बचाना ही चाहते हो, तो मेरी एक विशाल सभा करवाओ।

प्रजा ने मिलकर सभा का आयोजन किया। उस में कथा-कीर्तन के बाद साधु बाबा ने शराब का गुणगान करना शुरू किया। कहने लगे, शराब पीने वाला गीता में दी गई समदर्शन अवस्था को प्राप्त कर लेता है …. वह कभी बूढ़ा नहीं होता …. उसके घर में चोर चोरी नहीं कर सकता …इत्यादि।

धीरे-धीरे बात राजा तक भी पहुंची। उसने साधु बाबा को महल में बुलवा लिया और वहीं उनके ठहरने की व्यवस्था करवाई। फिर उनसे निवेदन किया, महाराज मुझे भी कुछ उपदेश दे का मेरा जीवन धन्य बनाएं।

साधु बाबा ने कहा, हे राजन, यह कलियुग है, इसमें हरिनाम बहुत जरूरी है, अत: आप हरिनाम जपा करो। फिर एक थैली में भरकर कुछ लकड़ी के मनके और एक ग्लास देते हुए कहा, इसे मैंने सिद्ध कर दिया है, अत: अब आप शराब इसी ग्लास में पीना। बस रोज एक-एक मनका इस ग्लास में डालते रहना। और हां, एक बार जो मनके डाल दिए, उन्हें कभी वापस नहीं निकालना।

राजा रोज एक मनका डालता, और उसी ग्लास में शराब पीता। धीरे-धीरे ग्लास मनकों से भरने लगा। और शराब कम होने लगी। शराब कम होने से नशा भी कम होने लगा। कम नशे में होश ज्यादा रहने लगा। तो एक दिन राजा ने देखा कि उसके मंत्री भी शराब पीकर पडे़ रहते हैं, किसी को राज्य का ध्यान नहीं है।

यह देख कुछ दिन वह गुप्त रूप से राज्य के भ्रमण पर निकला। उसने देखा कि प्रजा उससे प्रसन्न तो है, पर उसकी शराब पीने की आदत से डरी हुई है कि कहीं पड़ोसी राजा उन पर हमला ना कर दे।

राजा की आंखें खुल गईं। महल में वापस आकर उसने शराब न पीने का प्रण लिया और राज्य की हालत सुधारने में जुट गया। राजा को ठीक हुआ देख, मंत्रीगण भी संभल गए व राज्य का कार्यभार संभालने लगे।

राज्य की स्थिति को अच्छा देख राजा मन ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ और महल में साधु बाबा के पास पहुंचा। उन्हें प्रणाम कर बोला, आपकी बड़ी कृपा है कि आपने मेरी शराब छुड़ा दी। पर आपने जनसभा में यह क्यों कहा था कि शराब पीने वाला गीता में दी गई समदर्शन अवस्था को प्राप्त करता है…… आदि-आदि।’

साधु ने हंस कर कहा, राजन मैं ने गलत नहीं कहा था। शराब में धुत व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि उसके आस-पास क्या हो रहा है, उसका ध्यान तो शराब पीने में ही होता है। समदर्शन और क्या है? और देखो कि शराब पीने वाला बूढ़ा भी नहीं होता, क्योंकि वह तो जवानी में ही मर जाता है। और शराब पीने वाले के घर चोर भी नहीं आते। क्योंकि वह शराब के लिए घर का सारा सामान तक लुटा देता है। जब घर में कुछ बचेगा ही नहीं तो चोर उसके घर में क्यों आएंगे?

कहानी का प्रयोजन यह है कि साधु ने राजा को उपदेश दे कर नहीं युक्ति से उसकी लत छुड़ाई।

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