बाल संस्कार

शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्

श्रुतम्-83

शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्

यह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान का ध्येय वाक्य है जो कि कालिदास विरचित कुमारसंभव से लिया गया है।
अपि क्रियार्थं सुलभं समित्कुशं जलान्यपि स्नानविधिक्षमाणि ते ।
अपि स्वशक्त्या तपसि प्रवर्तसे शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ।।
–कुमारसम्भवम्

धार्मिक क्रियाओं के लिए समिधाएँ और कुश भी सुलभ है । सविधि स्नान हेतु उपयुक्त जल भी प्राप्त है ।
अपनी शक्ति के अनुसार तपश्चर्या में भी प्रवृत्त हो रहे हैं । फिर भी शरीर का ध्यान रखना । अर्थात् यह
जितना कार्य करने की क्षमता रखता है उससे अधिक कार्य मत लेना । अन्यथा यह अधिक दिन तक आपका साथ नहीं दे पायेगा; क्योंकि यह रोगाक्रान्त होकर क्षीण हो जायेगा । तब सब कार्य छूट जायेंगे ।
इसलिए समस्त धर्मों के साधनस्वरूप शरीर का ध्यान रखना चाहिए ।
शरीर स्वस्थ है तो हम अपने सामाजिक, नैतिक, धार्मिक, पारिवारिक दायित्वों को पूर्ण कर सकते हैं। इसे गीता में बतलाये गये सात्विक और स्निग्ध भोजन देना चाहिए । उचित आहार, विहार, जागरण,शयन तथा शक्ति के अनुरूप चेष्टा होने पर यह स्वस्थ रहकर आपके सम्पूर्ण क्रियाओं को करने में सक्षम रहेगा –इस बात का अवश्य ध्यान रखना; क्योंकि यह शरीर ही धर्म का मुख्य साधन है ।
किन्तु मात्र शरीर को सब कुछ समझ कर चौबीसों घंटे इसी शरीर की सेवा में लगे रहकर शेष सभी दायित्वों से मुँह मोड़ लेना भी अनुचित है।

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