बाल संस्कार

शस्त्र बड़ा या हिम्मत?

श्रुतम्-57

शस्त्र बड़ा या हिम्मत?

प्राय: लोग गुरुजी से कहते थे कि आप शाखा में जो लाठी सिखाते हैं, उससे क्या होगा ? आज तो बंदूक-पिस्तौल का युग है। ऐसे लोगों को श्री गुरुजी एक सत्य घटना सुनाते थे।
देश विभाजन के समय की बात है। पंजाब का जो भाग पाकिस्तान को मिल गया था, वहाँ से हिन्दू अपनी जान-माल बचाकर बड़ी कठिनाई से भारत की ओर आ रहे थे। अनेक हिन्दू परिवारों के पास शस्त्र भी थे। ऐसे ही एक परिवार की यह घटना है।
मुस्लिम गुंडों ने जब गाँव को घेर लिया, तो उस परिवार के लोग अपने घर की छत पर चढ़ गये। घर के मुखिया के पास दोनाली बंदूक थी। वह उसे लेकर बैठ गया। नीचे गुंडे दरवाजा तोड़ने की तैयारी कर रहे थे; पर उसकी बंदूक से वे डरे भी हुए थे।
अचानक एक गुंडे ने बड़ा छुरा निकाला और उसे लहराते हुए बोला, “सेठ, या तो अपनी बंदूक नीचे फेंक दे, वरना अभी यह छुरा फेंककर तेरा काम तमाम करता हूँ।’’ सेठ यह सुनते ही भयभीत हो गया और उसने बंदूक नीचे फेंक दी। तब तक मुस्लिम गुंडों ने दरवाजा तोड़ दिया। वे सब ऊपर चढ़ गये और उसी बंदूक से सेठ के पूरे परिवार को मार डाला।
श्री गुरुजी यह कथा सुनाकर बताते थे कि
शस्त्र से अधिक महत्त्व शस्त्र चलाने वाले हाथ और दिल की हिम्मत का है। शाखा में दंड के अभ्यास से इन दोनों को ही मजबूत करने का प्रयास होता है।

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