बाल संस्कार

शहीद दिवस

*श्रुतम्-143*

शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने हँसते-हँसते भारत की आजादी  के लिए 23 मार्च 1931 को 7:23 बजे सायंकाल फाँसी का फंदा चूमा था. इन शहीदों की पुण्यतिथि पर प्रतिवर्ष शहीद दिवस मनाया जाता है. तो आइये इन शहीदों का स्मरण कर लें.

*शहीद भगत सिंह*

जबसे सुना है मरने का नाम जिन्दगी है सर से कफन लपेटे कातिल को ढूँढ़ते हैं.  उन्हें अंग्रेजों की भारतीयों  के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी. ऐसी नीतियों के पारित होने के खिलाफ़ विरोध प्रकट करने लिए क्रांतिकारियों ने लाहौर की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की सोची. भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा ना हो तथा अंग्रेजो तक उनकी ‘आवाज़’ पहुंचे. निर्धारित योजना के अनुसार भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने ८ अप्रैल, १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में एक खाली स्थान पर बम फेंक दिया. वे चाहते तो भाग सकते थे पर भगत सिंह की सोच थी की गिरफ्तार होकर वे अपना सन्देश बेहतर ढंग से दुनिया के सामने रख पाएंगे. करीब २ साल जेल प्रवास के दौरान भगत सिंह क्रांतिकारी गतिविधियों से भी जुड़े रहे और लेखन व अध्ययन भी जारी रखा. जेल मे भगत सिंह और बाकि साथियो ने ६४ दिनो तक भूख हडताल की. २३ मार्च १९३१ को शाम में करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर भगत सिह, सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी दे दी गई. फांसी पर जाते समय वे तीनों गा रहे थे – दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़त मेरी मिट्टी से भी खुस्बू ए वतन आएगी . फ़ासी के पहले ३ मार्च को अपने भाई कुलतार को लिखे पत्र में भगत सिह ने लिखा था – उसे यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा (अन्याय) क्या है हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है दहर (दुनिया) से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख (आसमान) से क्यों ग़िला करें सारा जहां अदु (दुश्मन) सही, आओ मुक़ाबला करें. इससे उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है. शहीद भगत सिंह सदा ही शेर की तरह जिए. चन्द्रशेखर आजा़द से पहली मुलाकात के समय ही जलती मोमबती की लौ पर हाथ रखकर उन्होने कसम खाई कि उनका जीवन वतन पर ही कुर्बान होगा।

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