बाल संस्कार

शिक्षिका एवं मार्गदर्शिका के रूप में नारीशक्ति का योगदान

श्रुतम्-132

शिक्षिका एवं मार्गदर्शिका के रूप में नारीशक्ति का योगदान

वैसे तो माँ ही प्रत्येक इंसान की प्रथम गुरु और शिक्षिका होती है, माँ ही अपने बच्चों को अपनी संस्कृति, संस्कार, धर्म आचरण की शिक्षा देती है लेकिन भारत में ऐसी भी महान नारियां हुईं हैं जिन्होंन धर्ममार्ग से भटके हुए अपने पतियों की शिक्षिका बनकर उन्हें सन्मार्ग पर लाने का महान कार्य किया है। महाकवि कालिदास की पत्नी विद्योतमा , रावण की पत्नी मन्दोदरी , मेघनाद की पत्नी सुलक्षणा , धृतराष्ट्र की पत्नी गान्धारी और तुलसीदास की पत्नी रत्नावली का नाम ऐसी ही पतिव्रता नारियों और शिक्षिकाओं के रूप में योगदान के लिये प्रसिद्ध है।
तुलसीदास की पत्नी रत्नावली ने पति की शिक्षिका बनकर, मोह माया और खुद के रूप की आसक्ति में फंसे अपने पति को ईश्वर का रास्ता दिखाया और उनकी प्रेरणा से तुलसीदास ने एक महान महाकाव्य रामचरितमानस की रचना कर डाली। हिन्दी(अवधी) भाषा में रचित तुलसीदास की रामचरितमानस न होती तो आज रामायण घर-घर और जन-जन की जिह्वा तक न पहुँच पाती। नारी शक्ति ने माता, पतिव्रत पत्नी, महान बेटी, वीरांगना, स्वामीभक्त, वेदों की अनुवादिका और सूक्तों की रचनाकर, विदुषी, और शिक्षिका सभी रूपों में भारतीय संस्कृति के संवर्धन, सरंक्षण और अगली पीढ़ियों को हस्तांतरण में अनन्त प्रकार से योगदान दिये हैं।

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