बाल संस्कार

शिवाजी की भगवा ध्वज और गुरु के प्रति असीम श्रद्धा

*श्रुतम्-237*

 *शिवाजी की भगवा ध्वज और गुरु के प्रति असीम श्रद्धा*

 

छत्रपति शिवाजी के गुरुदेव, समर्थ गुरु रामदास एक दिन गुरु भिक्षा लेने जा रहे थे। उन पर शिवाजी की नजर पड़ते ही प्रणाम कर निवेदन किया, “हे गुरुदेव! मैं अपना पूरा राज-पाट आपके कटोरे में डाल रहा हूँ! अब से मेरा राज्य आपका हुआ!”

तब गुरु रामदास ने कहा, “सच्चे मन से दे रहे हो! वापस लेने की इच्छा तो नहीं?”

“बिलकुल नहीं! यह सारा राज्य आपका हुआ!” “तो ठीक है! यह लो!” कहते कहते गुरु ने अपना भगवा चोला फाड़ दिया! उसमे से एक टुकडा निकाला और शिवाजी के मुकुट पर बाँध दिया. और कहा, “लो! मैं अपना राज्य तुम्हें सौंपता हूँ. इसे चलाने और देखभाल के लिए। मेरे नाम पर राज्य करो! मेरी धरोहर समझ कर! मेरी तुम्हारे पास अमानत रहेगी।”

“गुरुदेव! आप तो मेरी भेंट लौटा रहे हैं.” कहते कहते शिवाजी की आंखें गीली हो गयी.

“ऐसा नहीं! कहा न मेरी अमानत है। मेरे नाम पर राज्य करो। इसे धर्म राज्य बनाये रखना, यही मेरी इच्छा है।”

“ठीक है गुरुदेव! इस राज्य का झंडा सदा भगवा रंग का रहेगा! इसे देखकर आपकी तथा आपके आदर्शों की याद आती रहेगी।”

“सदा सुखी रहो! कहकर गुरु रामदास भिक्षा हेतु चले दिए!

तब से मराठा साम्राज्य का ध्वज भगवा रंग का रहा।

सुनहरी मुकुट से बंधी भगवा वस्त्र की यह केवल कतरन नहीं है, यहां शिवराय के साहस, शासन और सरोकारों का सूत्र गुंथा है –

-एक सच्चा राजा जानता है कि कैसे हारे हुए युद्ध को भी जीतना है। भगवा जान की बाज़ी लगाने की प्रेरणा है।

-एक सच्चा राजा जानता है कि जब उसका जीवन समाप्त हो जाता है, तो भी उसे कैसे जीना चाहिए।

भगवा अग्निशिखा बताती है श्वास अंतिम हो तब भी उद्दीप्त संस्कारों जगमग आत्मा की यात्रा जारी रहती है।

 

शिवाजी महाराज जन-जन के नायक हैं। लेकिन स्वयं शिवाजी का नायक कौन है? निश्चित ही भगवा और भगवान में अभेद रचने वाली संस्कृति ही वह अदृश्य नायक है। शिवाजी राजे के रक्त में, हम सब की नस-नस में वही संस्कृति तो है! कोई भय नहीं, कोई भेद नहीं….जय शिवराय!

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