बाल संस्कार

श्यामलाल पाण्डवीय

स्वाधीनता का अमृत महोत्सव

मध्यभारत के गुमनाम नायक (Unsung Heroes) ……

श्यामलाल पाण्डवीय

श्यामलाल पाण्डवीय का जन्म सन् 1896 ई. में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री शंकरलाल पाण्डवीय ने अपनी प्रारंभिक षिक्षा ग्वालियर में करने के बाद विधि स्नातक की उपाधि प्राप्त की। श्यामलाल पाण्डवीय बाल्यकाल से ही उग्र स्वभाव के थे, वे गलत बात के साथ कभी समझौता नहीं करते थे। अपने स्वभाव के कारण ही सर्वप्रथम क्रांतिकारी गतिविधियों ने उन्हें प्रभावित किया। किन्तु एक वयस्क युवा के रूप में आपमें वैचारिक परिवर्तन आया और ग्वालियर के किसानों की दषा के प्रति संवदेनषील हो गये ।

महात्मा गांधी के भारतीय राजनीति में आने के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्वरूप एवं कार्यक्रमों में परिवर्तन आने पर श्यामलाल पाण्डवीय कांग्रेस की गतिविधियों से प्रभावित हुये। यद्यपि वह उससे पूर्व महामना मदन मोहन मालवीय से अधिक प्रभावित थे और राजषाही के प्रखर विरोधी थे। सन् 1917 के भारतीय राष्ट्रीय कॉग्रेस  के दिल्ली अधिवेषन में किसान प्रतिनिधि के रूप में श्यामलाल पाण्डवीय का भाग लेना किसानों की दष के प्रति उनकी संवेदनषीलता का परिचायक था। उन्होंने अधिवेषन में मात्र इस उद्देष्य से ही भाग लिया था कि वह सामंतषाही के अधीन किसानों की समस्याओं को कांग्रेस के पटल पर रख सकें।

सन् 1917 से लगभग दो दषक तक श्यामलाल पाण्डवीय किसान समस्याओं के लिए संघर्षरत् रहे। 13 अगस्त 1940 को कांग्रेस गतिविधियों में संलग्न होने के कारण श्यामलाल पाण्डवीय को गिरफ्तार कर एक वर्ष की कैद की सजा में ग्वालियर के कारागार में रखा गया। एक वर्ष बाद पुनः भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लेने तथा ग्वालियर में भारत छोड़ो आन्दोलन को गति प्रदान करने के अपराधा में अगस्त 1942 में उनको गिरफ्तार कर लिया गया। इस बार एक वर्ष आठ माह की जेल फरवरी 1944 तक के मध्य आपको ग्वालियर तथा षिवपुरी के कारागार में रखा गया।

फरवरी 1944 को कारागार से मुक्त होने पर श्यामलाल पाण्डवीय पुनः राष्ट्रवादी गतिविधियों में संलग्न हो गये। स्वतंत्रता प्राप्ति तक होने आपने अपनी लेखन प्रतिभा से ग्वालियर के संपन्न लेखक, विचारक एवं पत्रकारों में महत्वपूर्ण स्थान बनाया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी आपने संघर्ष जारी रखा और एक विधायक तथा मंत्री के रूप में ग्वालियर की सेवा की। आपकी राष्ट्र के प्रति सेवाओं के लिए राज्य शासन ने ताम्रपत्र सहित अनेकों सम्मान आपको जीवनकाल में प्रदान किये तथा मरणोपरांत ग्वालियर में आपके नाम से श्यामलाल पाण्डवीय शासकीय महाविद्यायल की स्थापना की गयी ।

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