बाल संस्कार

सर्वस्व बलिदानी दम्पति    : फुलेना बाबू व तारा रानी

सर्वस्व बलिदानी दम्पति    : फुलेना बाबू व तारा रानी

स्वाधीनता संग्राम में देश के हर भाग से लोगों ने प्राणाहुति दी। सिवान, बिहार के फुलेना बाबू तथा उनकी पत्नी श्रीमती तारा रानी ने इस यज्ञ में अपना पूरा परिवार अर्पण कर अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित कराया है।

अगस्त 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के लिए गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया था। फुलेना बाबू और उनकी पत्नी तारा रानी दोनों आंदोलन में कूद पड़े। तारा रानी को राष्ट्रीयता के संस्कार विरासत में मिले थे। जब वे डेढ़ वर्ष की ही थीं, तब एक अंग्रेज गुप्तचर ने उनके पिता से मित्रता बढ़ाकर उन्हें जहर दे दिया। इस कारण तारा रानी का पालन उनके बाबा ने किया। बाबा ने देशभक्ति की कहानियां सुनाकर तारा के मन में स्वाधीनता की आग भर दी। छोटी अवस्था में ही उनका विवाह सिवान के प्रसिद्ध राजनीतिक कार्यकर्ता फुलेना प्रसाद श्रीवास्तव से हो गया। अपने स्वभाव और संस्कारों के अनुरूप देशभक्त ससुराल पाकर तारा रानी बहुत प्रसन्न हुईं।

फुलेना बाबू जहां एक ओर गांधी जी के भक्त थे, वहां वे क्रांतिकारियों की भी भरपूर सहायता करते थे। बुद्धिमान, स्पष्टवादी और साहसी होने के कारण फुलेना बाबू की समाज और शासन में समान प्रतिष्ठा थी। जीवन यात्रा के साथ ही स्वाधीनता संग्राम में भी पत्नी का साथ पाकर फुलेना बाबू उत्साहित हुए। दोनों एक साथ सभा-सम्मेलन व विरोध प्रदर्शन में भाग लेते थे। फुलेना बाबू जहां पुरुषों को संगठित करते थे, तो तारा रानी महिलाओं का मोर्चा संभालती थीं। इससे अंग्रेज शासन को सिवान में परेशानी होने लगी।

1941 में तारा रानी व्यक्तिगत सत्याग्रह कर जेल गयीं। जेल से आते ही वे ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में जुट गयीं। यद्यपि उस समय उनकी मां तथा बाबा अस्वस्थ थे; पर उनके लिए देश का महत्व परिवार से अधिक था। 16 अगस्त, 1942 को सिवान में शासन के विरुद्ध बड़ा जुलूस निकला। उसमें तारा रानी के साथ उनकी मां, बाबा और पति तीनों शामिल थे। एक साथ पूरे परिवार द्वारा जुलूस में सहभागिता के उदाहरण प्रायः कम ही मिलते हैं।

विरोध प्रदर्शन अपनी गति से आगे बढ़ रहा था। ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ तथा ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ के नारे लग रहे थे। सिवान पुलिस थाने पर तिरंगा झंडा फहराना आंदोलनकारियों का लक्ष्य था। फुलेना बाबू इसके लिए आगे बढ़े। पुलिस को यह अपनी सीधी हार नजर आयी। अतः उन्होंने लाठीचार्ज कर दिया। इसके बाद भी जब फुलेना बाबू बढ़ते रहे, तो पुलिस ने गोली चला दी। फुलेना बाबू के साथ ही तारा रानी की मां और बाबा को भी गोली लगी।

फुलेना बाबू के नौ गोलियां लगीं थीं। यह देखकर तारा रानी सिंहनी की तरह भड़क उठीं। तब तक उनका हाथ भी गोली से घायल हो गया। इसके बाद भी उन्होंने अपनी साड़ी फाड़कर पति के माथे पर बांधी और तिरंगा लेकर थाने के ऊपर चढ़ गयीं। जब वे तिरंगा फहरा कर लौटीं, तब तक उनके पति, मां और बाबा के प्राण पखेरू उड़ चुके थे। इस प्रकार कुछ ही क्षणों में उनका घर-संसार उजड़ गया। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वे नारे लगाकर आंदोलनकारियों को उत्साहित करती रहीं।

पुलिस ने तारा रानी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया, जहां से आंदोलन की समाप्ति के बाद ही वे छूट सकीं।

(संदर्भ : मातृवंदना, क्रांतिवीर नमन अंक, मार्च-अपै्रल 2008)

 

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