बाल संस्कार

सात्विकता

*श्रुतम्-205*

 *सात्विकता*

जो सच्चिदानंद है उसकी लगन लगना ही सात्विकता है। मन का अधोगामी खिंचाव नष्ट होकर उसका ऊर्ध्वगामी होना सात्विकता है। जो श्रेय है, वही प्रेय मानते हुए श्रेष्ठ बनने की आकांक्षा अंतः करण में जगा कर उसके लिए प्रयत्नशील होना यही सात्विकता है। मुक्ति, मोक्ष अथवा कृतार्थ जीवन की प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन है सात्विकता। सत्व, रज और तम इन तीन गुणों से संपूर्ण सृष्टि व्याप्त है। मनुष्य का मन भी इन्हीं तीन गुणों से बना है। मन के इस त्रिगुणात्मक आवरण से आत्मा आच्छादित है। क्रमशः तामस को राजस में और राजस को सात्विक में विलीन कर अंततः सात्विकता को भी समाप्त करते हुए आत्म स्वरूप का दर्शन करना, यही हिंदू धर्म का चरम लक्ष्य है।  मानवी जीवन के सब उतार-चढ़ाव और सुख दुख इसी गुणत्रयी के कारण उत्पन्न होते हैं। इनकी व्यापकता को देखते हुए, यह संदेह है मन में आना स्वाभाविक है कि क्या यह कभी समाप्त हो सकते हैं? परंतु वैसे देखा जाए तो संसार की कौन सी वस्तु पूर्णतया नष्ट होती है और कौन सी पूर्णतया नवनिर्मित होती है? कोई भी नहीं। जिन्हें हम निर्मित एवं नाश कहते हैं वे केवल रूपांतर मात्र होते हैं। विज्ञान में भी द्रव्य और ऊर्जा की परस्पर परिवर्तनशीलता को मानकर समग्ररूपेण उसे अविनाशी माना है। बबूल के कांटे अनुपयोगी ही नहीं प्रत्युत कष्टदायी भी होते हैं, परंतु उसी की बनी बाड़ आम के पेड़ की रक्षा करती है। हम भी अपने अंदर निहित समस्त शक्तियों का इसी भांति प्रयोग कर उन्हें उपयोगी बना सकते हैं। महापुरुषों की जीवनी अथवा ऐश्वर्यशाली एवं यशस्वी राष्ट्रों का इतिहास देखने पर पता चलता है कि ये ही तीन गुण उनके अंदर थे। परंतु उनका सत्य प्रयोग उन्होंने किया और वैभव संपादन किया। मन की समस्त शक्तियों को ऊर्ध्वगामी मोड़ देने में ही व्यक्ति अथवा राष्ट्र की उन्नति का रहस्य निहित है।

*आज भारतवर्ष में दुर्भाग्य से तामसी बुद्धि अधिक क्रियाशील है। इसे रोकना होगा। सभी क्षेत्रों में सात्विक वृत्ति का उदय होना चाहिए, तभी हमारी वास्तविक उन्नति होगी और सच्चे आनंद और चिरंतन सुख का हमें लाभ होगा।*

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