बाल संस्कार

साधिका के रूप में नारी शक्ति का योगदान

श्रुतम्-130

साधिका के रूप में नारी शक्ति का योगदान

नारी का एक रूप साधिका का भी है। इस रूप में नारी भौतिक युग की मान मर्यादाओं को तज कर प्रभु प्रेम में रंग जाती है और उसका ईश्वर के प्रति प्रेम भौतिक परंपराओं में ना बंधकर दिव्य और आध्यात्मिक रूप ले लेता है। इस स्थिति में ईश्वर के प्रेम में डूबी उस नारी के शब्द ही काव्य बन जाते हैं। उसके रोम-रोम में प्रभु प्रेम की धारा प्रवाहित होने लगती है उसकी श्रद्धा और भक्ति इतनी अटूट होती है जिसे दुनिया की कोई शक्ति हिला नहीं पाती ऐसी ही ईश्वर उपासिका मेवाड़ की महारानी मीराबाई को कौन नहीं जानता है। महारानी का पद और राजकाज सब छोड़कर मीराबाई श्री कृष्ण की अनंत उपासिका बन गई और समाज की मर्यादाओं को त्याग कर श्रीकृष्ण को ही पति रूप में मानकर उन्हीं की भक्ति में लीन होकर एक महान साधिका के रूप में अमर हो गई। ऐसे ही राजकुमारी आण्डाल भी कृष्ण के ही रूप रंगनाथ प्रभु को अपना सर्वस्व और पति मानने लगी थी इन्हें दक्षिण भारत की मीरा के रूप में जाना जाता है।
कोटा नरेश पीपा की पत्नी सीतादेवी भी भगवान द्वारकाधीश की अनन्य उपासिका थी उन्होंने अतिथि सेवा को भगवान की पूजा के समान बताया और पति का वैभव मिट जाने के बाद भी सीतादेवी ने आथित्य धर्म निभाना नहीं छोड़ा। द्वार पर आए साधुओं को भोजन कराने के लिए उन्होंने स्वयं को भी बोली पर लगा दिया किन्तु भारतीय संस्कृति की ‘अतिथि: देवो भव’ की परंपरा को जीवंत रखने में अपना योगदान दिया।
स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस की पत्नी माँ-शारदा ने कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करके दुनिया को बताया कि भारतीय संस्कृति ऐसी महान तपस्विनीयों को जन्म देती है जो पति के साथ गृहस्थ धर्म निभाते हुए भी आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर सकती हैं। माँ-शारदा के पति उन्हें षोडशोपचार द्वारा देवी के रूप में पूजते थे पति की तपस्या में सहयोग करने के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने वाली मां शारदा महिलाओं को ब्रह्मचर्य पालन की प्रेरणा आज भी दे रही हैं।


साधिका के रूप में ही भील जाति की शबरी ने भी अपनी भक्ति के बल पर प्रभु श्रीराम को अपनी कुटिया में बुला लिया और भक्तिवश प्रभु राम को अपने झूठे बेर खिलाकर दुनिया को भक्ति की शक्ति का परिचय कराया।

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