बाल संस्कार

 सामाजिक चुनौतियों का सामना कर राष्ट्रहित को सर्वोपरि बनाया छत्रपति शिवाजी ने

*श्रुतम्-234*

 *सामाजिक चुनौतियों का सामना कर राष्ट्रहित को सर्वोपरि बनाया छत्रपति शिवाजी ने*

शिवाजी ने अपने धर्म की रक्षा और संवर्धन के लिए ब्राह्मणों, गायों और मंदिरों की रक्षा को अपना राज्यनीति का लक्ष्य घोषित किया था। लेकिन उस समय प्रचलित छुआछूत एक बड़ी बाधा था। *सन् 1674 तक पश्चिमी महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना* के बावजूद शिवाजी का राज्याभिषेक नहीं हो सका था। ब्राहमणों ने उनका घोर विरोध किया था, क्योंकि उनके अनुसार शिवाजी क्षत्रिय नहीं थे। राज्याभिषेक के लिए उन्हें क्षत्रियता का प्रमाण चाहिए था।

बालाजीराव  ने शिवाजी के मेवाड़ के सिसोदिया वंश से संबंध के प्रमाण भेजे, जिसके बाद रायगढ़ में उन्होंने शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक किया। राज्याभिषेक के बाद भी पुणे के ब्राह्मणों ने शिवाजी को राजा मानने से इनकार कर दिया। स्वयं प्रथम पेशवा ने शिवाजी के क्षत्रिय होने का सार्वजनिक रूप से विरोध किया। नाना प्रकार से असंतुष्ट ब्राहमणों को प्रसन्न करने के प्रयास हुए किन्तु इसके बावजूद जब ब्राहमणों ने इसे अपना अपमान घोषित कर दिया, तो शिवाजी ने अष्टप्रधान मंडल और प्रशासकीय कार्यों में मदद के लिए आठ मंत्रियों की अष्टप्रधान परिषद की स्थापना की। यह व्यवस्था हर किले पर लागू की गई। मराठा साम्राज्य 4 भागों में विभाजित था। हर राज्य में एक सूबेदार होता था जिसको प्रांतपति कहा जाता था। हर सूबेदार के पास भी एक अष्ट-प्रधान समिति होती थीं।

शिवाजी महाराज ने अपना साम्राज्य बाहुबल के साथ-साथ बुद्धिबल से स्थापित किया था। उन्होंने स्थापित साम्राज्यों और सल्तनतों की युद्ध-मशीनरी में एक प्रमुख दोष खोज निकाला। और अपनी मराठा सेना में चेन-ऑफ-कमांड को सर्वोच्च शक्तियां दीं। चाणक्य की नीति पर चलते हुए उन्होंने अपने अद्वितीय गुप्तचरों और कार्यकर्ताओं का तानाबान पूरे देश में फैला दिया था। उस दौर में राजा के मर जाने पर सैनिक भी युद्ध से भाग खड़े होते थे, लेकिन शिवाजी के सशक्त योद्धा उनकी मृत्यु के 27 साल बाद भी उनके सपने को जीवित रखने के लिए लड़ते रहे थे। क्योंकि *शिवाजी अपनी जागीर बचाने के लिए नहीं लड़े। वे स्वराज्य की स्थापना के लिए लड़े। उनका लक्ष्य एक स्वतंत्र साम्राज्य स्थापित करना था लेकिन उनके सैनिकों को स्पष्ट आदेश था कि भारत के लिए लड़ो, किसी राजा विशेष के लिए नहीं।*

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