बाल संस्कार

 सिंह सपूत

*श्रुतम्-144*

*सिंह सपूत*

“औरंगजेब , मेरे पास इससे भी शक्तिशाली शेर है।”… अपनी बात काटी जाती देख औरंगजेब का मुंह क्रोध से लाल हो गया। “जसवंत सिंह, तुम अपना शेर इस  खूखांर शेर से लड़ाओ। यदि तुम्हारा शेर हार गया तो तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जायेगा।”

बिना भय के जसवंत सिंह ने एक चुनौती स्वीकार कर ली।

दूसरे दिन दिल्ली के लाल किले के मैदान में मोटी छड़ों का बड़ा भारी पिजड़ा दो शेरों की लड़ाई के लिए रखा गया। भारी भीड़ जमा हुई बादशाह ठीक समय पर पहुंचकर अपने तख्त पर बैठ गया।

इतने में महाराज जसवंत सिंह अपने किशोर वय पुत्र पृथ्वी सिंह को साथ लेकर वहां पहुंचे ।

कहां है तुम्हारा शेर ?बादशाह चिंघाड़ा ।

“मेरा शेर मेरे साथ है। लड़ाई आरंभ करने की आज्ञा दीजिए” जसवंत सिंह बोले। बादशाह की आज्ञा से वह जंगली शेर पिंजड़े में छोड़ा गया और लोगों की सांस उस समय रुक गई जब पृथ्वीसिंह पिता को प्रणाम कर हंसते हंसते पिजड़े में घुस गया शेर पृथ्वीसिंह को देख रहा था । उसकी नेत्र ज्योति देख पूंछ दबाकर कई कदम पीछे हट गया किंतु शिकारियों ने भाले की नोक से उसे फिर उकसाया उसने क्रोधित हो  पर छलांग लगाई  पृथ्वी सिंह एक और हट गया और तलवार खींच ली

बेटा यह क्या करता है । तेरा प्रतिद्वंदी निहत्था है तो उस पर तलवार चलाएगा ?यह तो धर्म -युद्ध नहीं जसवंत ने पुकारा ।

छन् की आवाज के साथ फेंकी तलवार  पिजड़े से जा टकराई और पृथ्वीसिंह घायल सिंह की भांति शेर पर टूट पड़ा ।

शेर का जबड़ा अपने हाथों में पकड़ा और किसी कागज की भांति उसका शरीर फाड़ डाला। शेर की खून से सना जब वह बाहर  निकला तो पिता ने दौड़कर छाती से लगा लिया। भीड़ जय -जयकार कर उठी।

*इस प्रकार के भारत माता के वीर सपूतों के कारण इस धरती का स्वाभिमान जिंदा रहा है , हिंदुत्व डंका बजता रहा है और बजता रहेगा।*

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